गोरखपुर : आजकल “प्रचंड” गर्मी से पूरा उत्तर प्रदेश बिलबिला रहा है । एक तरफ लोग घरों में AC चला रहे हैं…तो दूसरी तरफ शहर की “बिजली” व्यवस्था फाल्ट, ट्रिपिंग और ट्रांसफार्मर ब्लास्ट से कराह रही है । बिजली कटौती के कारण आम आदमी समझ नहीं पा रहा कि आखिर करें तो करें क्या ? AC बंद करें तो “जान” चली जाए…और AC चलाए तो “बिजली” चली जाए ! लेकिन मजेदार यह है कि इस पूरे “संकट” की असली वजह को न “जनता” समझना चाह रही है…और न “सरकार” खुलकर बताना चाह रही है । नतीजा हर तरफ धरना, प्रदर्शन, घेराव, रोड ब्लॉक और न जाने क्या क्या ?
प्रकृति और तकनीक का टकराव…
इंसान तो “विज्ञान” के दम पर अपने आप को “सुपर पावर” समझने लगा है । लेकिन ये कौन समझाए कि “इंजीनियरिंग” और “विज्ञान” का एक सीधा सा “नियम” है कि…हर मशीन, हर धातु और हर इलेक्ट्रिकल सिस्टम की एक तयशुदा ऑपरेटिंग लिमिट होती है । बिजली विभाग के ट्रांसफार्मर, केबल, इंसुलेटर, एल्यूमिनियम कंडक्टर आमतौर पर 40°C से 45°C के वातावरण को ध्यान में रखकर “डिजाइन” किए जाते हैं । लेकिन आज “हालात” क्या हैं ? सड़कें 55°C तक “तप” रही हैं ! दीवारें “भट्ठी” बन चुकी हैं ! ट्रांसफार्मर के ऊपर की हवा भी “आग” जैसी गर्म है ! ऐसे में “ट्रांसफार्मर” के भीतर मौजूद ऑयल प्राकृतिक रूप से “ठंडा” हो ही नहीं पा रहा ! मतलब “कूलिंग सिस्टम” की मूल प्रक्रिया ही कमजोर पड़ चुकी है ।

अब इसके ऊपर लाखों लोग एक साथ AC, कूलर, फ्रिज, सबमर्सिबल, इन्वर्टर चार्जिंग चलाने लगें…तो “सिस्टम” के भीतर पैदा होने वाली “आंतरिक गर्मी” और बाहर की “प्राकृतिक गर्मी” मिलकर पूरे नेटवर्क को “मेल्ट डाउन” जोन में पहुँचा देती है । यही कारण है कि कहीं “फ्यूज” उड़ रहे हैं, कहीं “केबल” जल रही है, कहीं “ट्रांसफार्मर” ब्लास्ट हो रहे हैं और कहीं पूरी “लाइन” ट्रिप कर जा रही है । यहाँ तकनीक “फेल” नहीं हो रही बल्कि असल में तकनीक प्रकृति के “भौतिक” नियमों से हार रही है । इंसान ने बड़े-बड़े “पावर प्लांट” बना लिए । हजारों किलोमीटर लंबी ट्रांसमिशन लाइनें खड़ी कर दीं । “स्मार्ट ग्रिड” और “डिजिटल मॉनिटरिंग” भी लगा दी । लेकिन प्रकृति ने इस बार “हीटवेव” की ऐसी लहर फेंकी कि एक साथ लाखों लोग अपनी “जान” बचाने के लिए AC ऑन करने लगे । नतीजा बिजली की मांग अचानक से 30,000 मेगावाट के पार पहुँच गई ।

अब समस्या यह है कि बिजली “बनाना” अलग बात है और उसे हर मोहल्ले, हर ट्रांसफार्मर और हर गली तक सुरक्षित पहुँचाना अलग बात है । दुनिया का कोई भी “डिस्ट्रीब्यूशन” सिस्टम रातों-रात इतने अचानक बढ़े लोड को संभालने के लिए तैयार नहीं हो सकता । मतलब संकट सिर्फ बिजली उत्पादन का नहीं है…बल्कि संकट उस पूरे डिस्ट्रीब्यूशन इंफ्रास्ट्रक्चर का है जिसे दशकों पुराने तापमान और पुराने उपभोग पैटर्न के हिसाब से बनाया गया था ।
AC भी है कुछ दिन की मेहमान…
आज लोग AC की तरफ भाग रहे हैं । लेकिन यही हाल रहा तो अगली “गर्मी” से ही आप AC को भी “दोष” देना शुरू कर देंगे । क्योंकि जब बाहर की “हवा” ही 47°C, 48°C या 50°C हो जाए….तो “कंडेनसर” को गर्मी बाहर निकालने के लिए पर्याप्त ठंडी “हवा” मिलती ही नहीं है । कोई भी AC ऐसा नहीं बना जो 50 डिग्री के ऊपर के “टेम्परेचर” को झेल सकेगा । ये भ्रम है कि AC गर्मी को “खत्म” करता है । AC कमरे की गर्मी को “खत्म” नहीं करता बल्कि वह “गर्मी” को कमरे से निकालकर बाहर फेंकता है । अब लाखों AC जब एक साथ चलेंगे तो शहर की बाहरी हवा और “गर्म” होगी और बाहर का तापमान और ज्यादा बढ़ेगा । मतलब इंसान खुद अपने शहर को गर्मी की “प्रचंड” वेदना में धकेल चुका है । आने वाले समय में यह संकट और बढ़ेगा क्योंकि भारत में “हीटवेब” की अवधि, तीव्रता और फ्रीक्वेंसी लगातार बढ़ रही है….लेकिन हमारा बिजली इंफ्रास्ट्रक्चर, शहरों का डिजाइन, ट्रांसफार्मर क्षमता,एनर्जी प्लानिंग और AC की डिजाइनिंग अभी भी “बाबा आदम” के जमाने के हिसाब से चल रही है । मतलब सच तो यह है कि “तकनीक” फेल नहीं हो रही…बल्कि “तकनीक” उस “प्रकृति” के सामने घुटने टेक रही है जिसे इंसान ने खुद “असंतुलित” किया है ।

अब दैनिक जागरण की इस खबर को देख लीजिए ! लिखते हैं कि “गोरखपुर में कमिश्नर की फटकार बेअसर”….अरे तो अब तुम ही बता दो “पत्रकारिता के चित्रगुप्त”…कि कमिश्नर साहब करें तो करें क्या ? जब “वृक्षारोपण” के नाम पर सिर्फ “कागजों” में ही पेड़ लगाए जा रहे थे…तब उस वक्त क्या तुम “ठुमरी” गा रहे थे ? या फिर “कमीशनबाजी” की “आकाश गंगा” में “गोते” लगा रहे थे ? इसलिए बस “खामोश” रहो और सुनो क्योंकि…इस वक्त प्रकृति “इंसान” को एक सीधा सा संदेश दे रही है… कि तुमने शहर तो “कंक्रीट” के बना लिए…पेड़ काट दिए…धरती को “तंदूर” बना दिया…और अब वही “तंदूर” तुम्हारी “तकनीक” की “छत” पिघला रही है । आने वाले समय में यह “संकट” और बढ़ेगा…क्योंकि यदि “आँख” उठाकर सिर्फ अपने “शहर” में ही देख लीजिए…तो पता चलेगा कि बड़े बड़े विशालकाय “वृक्ष” चौड़ीकरण के नाम पर किस “निर्ममता” से काट दिए गए । एक बार झांक आइए अपनी उस “यूनिवर्सिटी” में जहाँ लगभग 1200 पेड़ “बहानेबाजी” की भेंट चढ़ा दिए गए । इसलिए बिजली कटौती पर “छाती” पीटना बंद कीजिए… और “मजे” लीजिए क्योंकि “हीटवेब” अब “अपवाद” नहीं बल्कि “सामान्य नियम” बनता जा रहा है ।

