आपने कई घटनाएं देखी और पढ़ी होंगी..जिसमे घर के किसी सदस्य ने ही दरवाजे की कुंडी रात में खोली ! बाहरियों को घर के अंदर घुसाया और कांड करा दिया । घर के अंदर घुसे लोगों ने जो कांड किया वो तो एक अपराध था…. लेकिन जिसने कुंडी खोली… वो क्या था ? एक अपराध, या फिर गंभीर नैतिक भ्रष्टाचार ?
जब भी भ्रष्टाचार की बात होती है तो लोग समझते हैं कि नोटों के गड्डियों की बात हो रही है । आपको लगता है कि भ्रष्टाचार वही है जिसमें किसी अफसर के घर से करोड़ों बरामद हों, किसी जज के नौकर के कमरे से नोटों की गड्डियां निकलें, ईडी और सीबीआई छापा मारे और टीवी चैनल लाल घेरे में रकम चमका चमका कर चलाने लगें । नोटों की गड्डियाँ वाला तो सबसे छोटा भ्रष्टाचार है। असली भ्रष्टाचार वो है जो बैंक खाते में नहीं मिलता बल्कि आदमी की आत्मा में पलता है । जो विचार बेच कर किया जाता है । इस वक्त आप तमाम ऐसे अखबारी पत्रकारों से मिलते होंगे जिनके दावे सुनकर ऐसा लगता होगा कि उनसे बड़ा ईमानदार पत्रकार कोई है ही नहीं । कुछ तो आज भी पहले की तरह ऐसे हैं कि लंबे कुर्ते, छोटे पायजामे..बिना कंघी किये..बिना दाढ़ी बनाये घूमते हैं…लेकिन भीतर ऐसा आत्मविश्वास जैसे “सत्य” का ठेका सिर्फ इन्हीं के पास हो ।
एक दशक पहले की बात है जब मैने ऐसे भी पत्रकार देखे जो खुलेआम नेताओं के “पेरोल” पर थे । हिंदी बेल्ट में तो अर्जुन सिंह और मुलायम सिंह कुख्यात थे पत्रकारों को पालने के मामले में ! इन पत्रकारों को तनख्वाह अखबार से मिलती थी और मोटी कमाई होती थी किसी नेता के बंगले से ! ये बातें किसी से छिपी नहीं थीं क्योंकि पुलिस की फाइलों में सब दर्ज रहता था…और इस सारे तमाशाई गणित को मेरे एक सहयोगी अपने गुरु रिश्तेदार एक पूर्व आईपीएस के साथ बैठकर समझने की कोशिश करते रहते थे। कौन किस मुख्यमंत्री के यहाँ बैठता है, कौन किस पार्टी के इशारे पर खबर रोकता है, कौन किस नेता के लिए माहौल बनाता है, सबकी “कुंडली” पुलिस की फाइलों में तैयार रहती थी ।
आज उन लोगों की बात करने का कोई फायदा नहीं जो सीधे पैसे लेते हैं….क्योंकि वो “चिरकुट” टाइप के छोटे खिलाड़ी हैं । असली खिलाड़ी वो हैं जो खुद को ईमानदार कहते हैं । पैसे नहीं लेते हैं लेकिन “विचार” बेचते हैं । मतलब एक लंबी अवधि का “निवेश” ! इन्होंने कभी रिश्वत नहीं ली….कभी लिफाफा नहीं लिया… लेकिन अपनी कलम, अपना प्रभाव, अपना अखबार, अपनी आवाज किसी सत्ता, किसी विचारधारा, किसी नेता के चरणों में रख दी । आज फर्क सिर्फ इतना है कि तब “सोशल मीडिया” नहीं था और आज है । जनता को पता ही नहीं चलता है कि खबर के नाम पर उसकी सोच को किस कदर मोड़ा जा रहा है
काफी पहले इंडियन एक्सप्रेस, इंडिया टुडे, टाइम्स ऑफ इंडिया और हिंदुस्तान टाइम्स ही देश का दिमाग तय करते थे । दूरदर्शन एक खुला सरकारी मंच था । लेकिन निजी अखबारों में बैठे कई लोग सत्ता के लिए हवा बनाते रहते थे । कुछ पता ही नहीं चलता था क्योंकि कोई कांग्रेस के लिए लिखता था, कोई वामपंथ के लिए कोई किसी मुख्यमंत्री के लिए…और कोई भावी सत्ता के लिए ।
आज वो ईमानदार लोग हैं जिन्होंने अपनी विचारधारा तो चुपके से बेच दी लेकिन उसके बदले में पैसे नहीं लिए इसलिए वे ईमानदार कहलाते रहे । फिर एक दिन वही लोग “राज्यसभा” पहुँच गए । कोई विश्वविद्यालय का “कुलपति” बन गया…कोई “विधायक” बन गया… कोई “प्रसार भारती” में बैठ गया… कोई “सलाहकार” बन गया..तो कोई “आयोग” में पहुंच गया ।
आज देश में लाखों बेरोजगार युवा घूम रहे हैं…58 और 60 की उम्र में आदमी को रिटायर कर दिया जाता है…लेकिन कुछ लोग रिटायर होते ही और बड़ी कुर्सियों पर बैठ जाते हैं..आखिर क्यों ? क्या उनकी प्रतिभा अचानक 70 की उम्र में छलछला कर फूट पड़ी है ?
नहीं…बल्कि ये उन सेवाओं का इनाम होता है जो उन्होंने अपने कार्यकाल में चुपचाप दी होती हैं । कोई “जज” जीवन भर फैसलों से रास्ते बनाता है और रिटायर होते ही “आयोग” में पहुंच जाता है । कोई अफसर “फाइलों” में खेल करता है और बाद में “राज भवन” में बैठ जाता है । कोई “पत्रकार” सालों तक नैरेटिव गढ़ता है और फिर राज्य सभा “विधान सभा ” में पहुँच जाता है ।
और जनता…? जनता सिर्फ इतना देखती रह जाती है कि अरे वाह, कितना ईमानदार आदमी था । कभी पैसे नहीं लिए…इसने तो रोज दाढ़ी तक नहीं बनाई…ये पूछना क्या नहीं बनता कि क्या सिर्फ पैसे न लेना ही ईमानदारी है ? अगर किसी ने देश की “सोच” बेच दी… किसी ने “सच” दबा दिया..किसी ने सच जानते हुए भी “चुप्पी” ओढ़ ली…जो कुछ कर सकता था फिर भी तमाशबीन बना रहा…किसी ने गलत आदमी को “महान” और सही आदमी को “खलनायक” बना दिया… तो क्या वो “ईमानदार” है ? जिस अफसर ने कभी “रिश्वत” नहीं ली लेकिन शराब की “बोतल” ले ली… विदेश यात्रा ले ली…सत्ता की कृपा ले ली…फिल्मी हीरोइन का शौक पूरा कर लिया…तो क्या वो ईमानदार हैं ? जिसे सीमा पार से आती एके 47 नहीं दिखी…जिसे ड्रग्स से भरे कंटेनर नहीं दिखे… लेकिन रिटायरमेंट के बाद बड़ी कुर्सी मिल गई…तो क्या वो सिर्फ योग्यता का “जलवा” था ?
कुछ लोग प्रेस कॉन्फ्रेंस में मिलने वाली जयपुरी रजाई, तौलिया, इलेक्ट्रॉनिक डायरी और पाँच सितारा होटल के खाने पर बिक गए…कुछ “दरगाह” की ड्योढ़ी पर जालीदार टोपी पहनकर बिक गए…कुछ शराब की बोतल पर खुश हो गए…और कुछ सत्ता के इतने करीब चले गए कि खबर और प्रचार के बीच का फर्क ही मिट गया । लेकिन इतिहास में ईमानदार भी वही कहलाए…क्योंकि उनके घर से “नोट” नहीं निकला !
यही इस देश का सबसे बड़ा भ्रम है..कि हमने भ्रष्टाचार के अपराध को सिर्फ पैसों तक सीमित कर दिया है । जबकि सबसे खतरनाक भ्रष्टाचार “वैचारिक” होता है । वही देश की “आत्मा” को खाता है…वही जनता की “सोच” को मारता है…वही लोकतंत्र को भीतर से “खोखला” करता रहता है…और फिर यही लोग चार लोगों के बीच बैठ कर “नैतिकता” पर भाषण देते हैं ।
मुझे हँसी तब आती है जब लोग मेरे सहयोगी पत्रकार को “नकारात्मक खबरों” का “वाहक कहते हैं । अरे भाई, जो कमियाँ हैं उसे न दिखाए तो क्या आपकी “चालीसा” गायें ? अब आप कहेंगे कि जो अच्छा हो रहा है वो भी तो दिखाइए ! बिल्कुल दिखाना चाहिए लेकिन….ये क्यों दिखना चाहिए कि आप क्या अच्छा कर रहे हैं ? और अच्छा करके कोई “अहसान” कर रहे हैं क्या ? आपको कुर्सी और तनख्वाह इसलिए ही मिलती है कि आप सिर्फ अच्छा ही करें ! लेकिन मजेदार तो यह है कि आप उम्मीद पाले बैठें हैं कि कोई उसे दिखाये..जैसे अच्छा करके आप आवाम पर अहसान कर रहे हैं । फिर कहता हूँ कि पत्रकारिता को “वाच डॉग” इसलिए कहा गया है कि वो कुछ “गलत” होता देखे तो भौकें ! और कुछ “गलत” न हो रहा हो तो “शांत” बैठे । बस इसके अलावा “पत्रकारिता” का कोई धर्म नहीं होता । व्यवस्था और पत्रकारिता को यह “भान” कब होगा कि पत्रकार सिर्फ “पत्रकार” होता है…कोई प्रचारक या “ब्रांड अम्बेसडर” नहीं
कुछ लोग किसी पत्रकार को फेसबुक पर “कुत्ता” बताकर खुश हो लेते हैं कि “गरिया” लिया । अब इन “गटर” के कीड़ों को कौन बताये की पत्रकारिता की किताब का यदि एक “पन्ना” भी पढ़ा होता….तो पता चलता कि “पत्रकारिता” को “वाच डॉग” कहने के पीछे मंशा यही है कि… सही मायनों में “पत्रकारिता” करने वाला पत्रकार “कुत्ते” से अलग तो बिल्कुल भी नहीं है । लेकिन ये बात तो वो समझेंगे जो सही मायनों में “पत्रकार” हैं ! “गटर” के कीड़ों को यह बात कहाँ समझ आएगी ?
अरे ये खबरें कब तक दिखाई देती रहेंगी कि कौड़ीराम में “कटोरा” गिरा…पीपीगंज में “पाइप” कटा और गोलघर अब “गोल” की बजाय “चौड़ा” हुआ । आपके लिए यह जानना जरूरी है कि आखिर क्यों हर सत्ता अपने पत्रकार, अपने जज, अपने अफसर और अपने बुद्धिजीवी तैयार करती है ? आखिर क्यों रिटायरमेंट के बाद अचानक कुछ लोगों का “भाग्य” चमक उठता है ? आखिर क्यों कुछ लोग हर “सरकार” में फिट हो जाते हैं ? क्योंकि ये योग्यता नहीं होती ! ये नेटवर्क होता है ! ये सेटिंग होती है….और ये वर्षों तक निभाई गई वैचारिक दलाली का “प्रतिफल” होता है !
अब आजकल वो वामी और खांग्रेसी, आपिया वाली गाली पुरानी हो गई है । अब तो कुछ लोग फेसबुक पर ही सीधे “माँ बहन” पर ऐसे उतर आते हैं…जैसे उनके “माँ बहनों” ने घर में ही उन्हें “चढ़ने उतरने” की ट्रेनिंग दे रखी हो ।
नोट : इस पोस्ट में किसी का नाम तो नहीं है लेकिन कुछ एक को “मिर्ची” फिर भी लगेगी…और लगनी भी चाहिए ! वैसे भी ईमानदारी “आत्मा” में होती है… “परवरिश” में होती है…”रक्त” में होती है…लेकिन “सब” में नहीं हो सकती !

