सलाहकारों के “साम्राज्य” में नंगी होती व्यवस्था !

व्यवस्था अगर “गोश्त” की तिजारत करने लगे… तो उसके पहरेदारों से “शाकाहारी” होने की उम्मीद करना भी एक तरह की मासूमियत ही है । आज जो कुछ “मुल्क” में चल रहा है…उसमें सबसे बड़ा किरदार उन “सलाहकारों” का है जो हर दफ़्तर, हर कुर्सी और हर “निज़ाम” के पीछे बैठे हुए हैं । प्रेस क्लब से लेकर प्रशासन तक…सत्ता से लेकर न्याय-तंत्र तक… हर जगह सलाहकारों की एक पूरी “फ़ौज” मौजूद है । मगर रूहानी नज़र से देखें तो ये “सलाहकार” कम और मंझे हुए “कलाकार” ज़्यादा दिखाई देते हैं ! ऐसे कलाकार जो “सच” को मेकअप लगाकर मंच पर झूठ की तरह पेश करने में “माहिर” हो चुके हैं ।

सबको पता है कि पहले से कराह रही अदालती व्यवस्था एक बार फिर महीने भर की छुट्टियों पर जा चुकी है । उधर बार काउंसिल ने यह कहकर सनसनी फैला दी है कि मुल्क की अदालतों में काम कर रहे चालीस फ़ीसदी वकील “फ़र्ज़ी” हैं । इधर पुलिस की प्रेस कॉन्फ्रेंस में चेन स्नैचरों ने एसपी की मौजूदगी में कैमरों के सामने मूँछों पर “ताव” देकर जैसे यह ऐलान कर दिया है कि…अपराधी प्रदेश छोड़कर नहीं गए…बल्कि प्रदेश ही “अपराधियों” के हवाले कर दिया गया है” ! देखे वीडियो..

पेपर लीक मामले में असली “गुनहगार” चिन्हित हो गए हैं…मगर कार्रवाई सबसे पहले उन छात्रों और कोचिंग संचालकों पर कर दी गयी…जिन्होंने सड़क पर उतरकर “व्यवस्था” से सवाल पूछने की जुर्रत की थी । यानी इस दौर में “जुर्म” करना उतना ख़तरनाक नहीं…जितना “जुर्म” पर सवाल उठाना है । और हमारा चौथा खम्भा…? उसका इन सब मसलों से क्या वास्ता ? उसका ध्यान तो अब “पत्रकारिता” से हटकर सिर्फ खाने चबाने और पीने पिलाने पर केंद्रित हो चुका है । हैरत तो तब हुई जब एक पत्रकार महोदय ने सोशल मीडिया पर फ़रमाया कि….“कलम से आग उगलने वाले, सूरज की तपिश को ठंडा करने के लिए लोगों को पिला रहे हैं शीतल जल ” !

सवाल तो यह है हुज़ूर…कि यहाँ किस कलम ने “आग” उगली है….और यहाँ गोरखपुर में किस कलमकार के “कलम” की “जुर्रत” है जो आग उगल दे ? अरे यहाँ तो बरसों पहले ही “कलम” की स्याही को फायदे के “कैलकुलेटर” में तब्दील कर दिया गया है । अब धनिया मिर्चा बेचने का इतिहास संजोए हुए कुछ विशेषज्ञ तुरंत “खखार” कर खुद अपने ही “मुँह” पर थूकते हुए अपनी “चोंच” खोलेंगे…और पूछेंगे कि…क्या गर्मी में शरबत पीना पिलाना भी अब “गुनाह” है ?

अरे “चोंचधारी शकरकंद” महोदय…. “शरबत” पीना और पिलाना तो “सवाब” का काम है…लेकिन इसमें “गुनाह” यह है कि जिस पेशे का मक़सद “सच” की प्यास बुझाना था…वही पेशा अब सिर्फ गला तरने और पेट भरने के इंतज़ाम में लगा हुआ है । खाना खिलाना और पानी पिलाना तभी अच्छा लगता है जब आदमी अपने असली मक़सद से भटका हुआ न हो । आप कहते हैं कि ये समाजसेवा है ! अरे जरा आईने के सामने एक बार खड़े हो जाइए अपनी कलम के साथ….और पूछिये आईने से कि…आपको कौन सी “समाजसेवा” करनी चाहिए थी ? डर तो इस बात का है जनाब..कि जिस रफ़्तार से “पत्रकारिता” अपनी साँसें गँवा रही है…उसे देखकर ऐसा लगता है जैसे उसकी “दर्दनाक मौत” पर कोई सलाहकार बड़ी गंभीरता से यह “मशविरा” न दे बैठे…. कि पत्रकारिता की मौत का “तेरहवीं भोज” इंतज़ाम बेहद शानदार होना चाहिए ! आख़िर खाने-चबाने का मौक़ा बार-बार थोड़े ही आता है !

देखता हूँ कि इस देश में धीरे धीरे सारी व्यवस्था “क्लब” में तब्दील होती चली जा रही है । पत्रकारों का क्लब..अफसरों का क्लब…उद्योगपतियों का क्लब…वकीलों का क्लब…नेताओं का क्लब और कभी कभी “न्यायपालिका” का भी क्लब ! इन क्लबों में “नियम” बाद में आते हैं और “पहचान” पहले आती है ! यहाँ “योग्यता” चले न चले लेकिन “परिचय” और “पैसा” पहले चलता है ! यहाँ “कानून” चले न चले “नेटवर्क” जरूर चलता है ।

जब विधि विद्वानों का तर्क और उदाहरण सुनता हूँ तो ऐसा लगता है…..जैसे किसी केस का “फेयर ट्रायल” करने वाले “जज” मुट्ठी भर रह गए हैं । स्थितियां देखकर ऐसा लगता है जैसे अब भारत के सबसे मजबूत शब्द लोकतंत्र धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद नहीं रह गए हैं बल्कि सबसे मजबूत शब्द बन चुका है विचाराधीन ! फ़ाइल विचाराधीन…फैसला विचाराधीन…मामला विचाराधीन…अपील विचाराधीन…जाँच विचाराधीन…और सुनवाई विचाराधीन ! “दादा” ने केस किया था…”बाप” ने तारीख ली…”बेटे” ने बहस सुनी..और अब “पोता” फैसला पढ़ेगा । लेकिन इस स्थिति के बाद भी जब “न्याय” व्यवस्था एक महीने की छुट्टी पर जाती है..तो यह देखकर देश के “गिरगिट” मन ही मन मुस्कुराते हैं और “सीना” ठोककर कहते हैं कि उन्हें “न्यायपालिका” पर पूरा भरोसा है ।

मैं फिर कहता हूँ कि यह हाल “सलाहकारों” के सलाह का ही नतीजा है । “कालीदास” की कहानी याद करिये । “विद्योत्तमा” ने एक उंगली दिखाई थी । “कालीदास” ने दो दिखा दी..और सलाहकारों ने “विद्योत्मा” से व्याख्या कर दी कि एक “आत्मा’ है और दूसरा “परमात्मा” । जबकि बेचारे “कालीदास” मन ही मन “विद्योत्मा” से कह रहे थे कि तू मेरी एक “आँख” फोड़ेगी तो मैं तेरी दोनों फोड़ दूंगा । देश में सारी व्यवस्था और सत्ता अब सलाहकारों के भरोसे चल रही है…और “सलाहकार” इतने कमजोर हैं कि “सच” स्वीकार करने की जगह उस पर “झूठ” का प्लास्टर लगा देते हैं । बस, यहीं से “समस्या” शुरू हो जाती है ।

सलाहकारों की असलियत जानने के लिए एक बार “व्यवस्था” को वस्त्र पहनाए गए । सलाहकारों ने “व्यवस्था” को बताया कि ये कोई साधारण “कपड़ा” नहीं है । इसे सिर्फ वही देख सकता है जो मन का सच्चा हो…जो ईमानदार हो… जो पवित्र हो ! इसलिए किसी की बातों पर ध्यान मत दीजिएगा । “व्यवस्था” ने दिव्य वस्त्र पहने और “आईने” के सामने खड़ी हो गयी । उसे खुद अपना ढीला लटका हुआ “शरीर” दिख रहा था । उसे दिख रहा था कि उसके तन पर कुछ भी नहीं है । लेकिन वो ये कैसे मान लेती कि वो मन की झूठी है ? उसने खुद को समझाया कि नहीं…ये तो दिव्य वस्त्र है…अलौकिक हैं ! और फिर वो निकल पड़ी साम्राज्य घूमने… जनता ने देखा…दोस्तों ने देखा… सबने देखा कि “व्यवस्था” नंगी है । लेकिन सबने कहा अद्भुत…दिव्य… अलौकिक ! “सच” सबको दिख रहा था लेकिन “झूठ” सब बोल रहे थे…क्योंकि सच बोलने में खतरा था । व्यवस्था घूमती रही लेकिन किसी में हिम्मत नहीं थी कि कह दे कि व्यवस्था का पूरा “बायलोजिकल” शरीर साफ दिख रहा है । कोई कैसे कह देता “सच” ? क्योंकि इस देश में “सच” से ऊपर नौकरी है….कुर्सी है…पोस्टिंग है…ट्रांसफर है…बच्चे की फीस है…बैंक बैलेंस है…कमीशन है…दलाली है !

फिर एक “बच्चा” आया…उसने “व्यवस्था” को देखा और हंस पड़ा ! “व्यवस्था” चौंकी और बोली कि.. क्यों हँस रहे हो ? बच्चे ने कहा..क्योंकि तुम इतने बड़े होकर भी “नंगे” घूम रहे हो ! बच्चे का वाक्य सुनकर पूरी “व्यवस्था” और “सलाहकार” कांप गए ! दोस्त, दरबारी और जनता “सकते” में आ गए…क्योंकि बच्चे मन के सच्चे होते हैं । उन्हें माँ की “गोद” का तो पता होता है…लेकिन “सत्ता” और “व्यवस्था” की “गोद” का नहीं !

जब (ए डी) आफिस में बैठा एक अधिकारी..जब जिला अस्पताल में बैठे दो टके के एक भ्रष्टाचारी लैब टेक्नीशियन से डेढ़ लाख रुपये लेकर… जिला अस्पताल के लिए अपने “स्वजातीय” प्रमुख अधीक्षक का चुनाव करता है….तब उस पाप का भागीदार सिर्फ (ए डी) आफिस का वो “अधिकारी” नहीं होता…बल्कि वो सभी होते हैं…जो उस “व्यवस्था” का हिस्सा या उस “व्यवस्था” से लाभान्वित होते हैं । कोई ये कहकर नहीं बच सकता कि हम तो मजबूर थे और हमें “ऊपर” से कहा गया था ! क्योंकि “प्रारब्ध” और “नियति” के “रजिस्टर” में दो और दो मिलकर “चार” ही होता है…न “पाँच” की गुंजाइश होती है…न “तीन” की और न ही “बाईस” की !

By systemkasach

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