पादरी बाजार में छेड़खानी का मामला हो…या फिर प्रेम संबंधों के नाम पर “अश्लील” वीडियो बनाकर “ब्लैकमेलिंग” का खेल खेलने वाली समाज मे घट रही अन्य घटनाएं ! आज की अधिकांश प्रेम कहानियाँ भरोसे की कमी और बदले की “आग” में दम तोड़ती दिखाई देती हैं । मोहब्बत, जो कभी दो दिलों के बीच का सबसे पाक “एहसास” मानी जाती थी…अब कई जगहों पर शक, सौदेबाज़ी और साज़िश के अंधेरे में कैद होती जा रही है । एक तरफ वे लड़कियाँ और महिलाएँ हैं जो अपने रिश्तों को अपनी निजता की चौखट से बाहर नहीं निकलने देतीं… जिनके लिए प्रेम अब भी एक “एहसास” है, “इबादत” है… भरोसे की एक ख़ामोश “डोर” है । लेकिन दूसरी तरफ़ वे चेहरे भी हैं जिन्होंने प्रेम को “धंधा” बना दिया । जहाँ “जज़्बात” की सेटिंग … रिश्ते की जगह “टारगेट”… और “मोहब्बत” की मीठी बातों के पीछे ब्लैकमेलिंग, उगाही और बर्बादी का पूरा “कारोबार” पलता है ।
जब प्रेम का बाजार परवान चढ़ा तो इसे कारोबार बनाने का “दस्तूर” भी परवान चढ़ा… और तब इस खेल में पेशेवर महिलाएँ और गिरोह खुलेआम उतर आए । नतीजा यह हुआ कि समाज ने लखनऊ की “सफलता पाठक” जैसे चेहरे देखे । ऐसे चेहरे जिन्होंने दुनिया को दिखाया कि किस तरह “पेशेवर” महिलाओं और लड़कियों का गैंग बनाकर ,प्रेम का झाँसा देकर, भावनाओं को “हथियार” बनाकर और निजी पलों को कैद करके इंसानों की ज़िंदगियों को तबाह किया जा सकता है । मोहब्बत की पींगें बढ़ाकर लोगों को “जाल” में फँसाना… फिर वीडियो, चैट और रिश्तों को “हथियार” बनाकर उगाही करना सिर्फ “अपराध” नहीं बल्कि इंसानी भरोसे का “कत्ल” है । और जो लोग यह सोचकर निश्चिंत बैठे हैं कि ऐसे “गैंग” सिर्फ कानपुर या लखनऊ तक सीमित हैं तो…उन्हें शायद अपने आसपास की दुनिया को थोड़ा गौर से देखने की ज़रूरत है…क्योंकि आपका गोरखपुर भी इस “सड़ांध” से अछूता नहीं है । बहुत जल्द जब कुछ “नकाब” उतरेंगे…तो समाज यह देखकर सन्न रह जाएगा कि पर्दे के पीछे कौन-कौन से चेहरे छिपे बैठे थे ? किसी तथाकथित “पत्रकार” का चेहरा…किसी कथित “मुतवल्ली” का चेहरा…और उन “दलालों” का चेहरा, जिनकी “दाल रोटी” ऐसे ही “धंधों” की बदौलत अब तक चलती रही है । लेकिन इन सबके बीच सबसे बड़ा “सवाल” अब भी वहीं खड़ा है कि इस अविश्वास भरे माहौल में आखिर प्रेम संबंधों में जुड़ी लड़कियाँ क्या महसूस करती होंगी ? क्या उन्हें अपने रिश्तों में सुरक्षा का एहसास होता है ? क्या वे आज भी “प्रेम” तलाशती हैं…या सिर्फ एक ऐसा कंधा, जिस पर “भरोसा” किया जा सके ।
हालात ये हैं कि “फेसबुक” पर एक स्त्री के “फ्रेंड रिक्वेस्ट” स्वीकार करते ही लोग “राफेल” की गति से उसके “इनबॉक्स” में एंट्री मारते हैं । किसी को “हाय” करनी है… किसी को “हैलो”…किसी को “दोस्ती” करनी है…तो किसी को शादी !कोई साथ में “चाय” पीना चाहता है…तो कोई “कॉफी”…कोई साथ में “लंच” करना चाहता है तो कोई कैंडिल लाइट डिनर ! कोई किये जा रहा है लगातार “मैसेंजर” पर कॉल…कोई भेज रहा “लव इमोजी !…कोई भेज रहा “फ्लाइंग किस” ! कोई 15 साल का है…कोई 50 साल का है…तो कोई है 75 साल का ! सबको जानना है क्या करती हो…कहाँ रहती हो..कहाँ “जॉब” करती हो…क्या “अकेले” रहती हो…? कुछ “मोहित” हैं उसके “चेहरे” पर…कुछ को अच्छी लग रही है उसकी “मासूमियत”…कुछ डूब जाना चाहते हैं “आंखो” में…कुछ बांध रहे हैं पुल “तारीफों” के…और कुछ लगे हैं साबित करने में खुद को श्रेष्ठ “आशिक” !
इनबॉक्स में आने वालों की उम्र, जाति, मजहब, नाम भले ही अलग अलग है..लेकिन “ठरक” सबकी एक ही है ! इसलिए इतना आसान भी नहीं है औरत और लड़की होकर “फेसबुक” चला पाना…और इतना आसान नहीं है “मैसेंजर” का “इनबॉक्स” खोल पाना ! माहौल ऐसा है कि लड़कियां “प्रेम” से नहीं बल्कि “प्रेम चोपड़ों” से डरती हैं !
लड़कियां “प्रेम” से क्यों डरती हैं ? इस सवाल का जवाब किसी मनोवैज्ञानिक की किताब में नहीं मिलेगा । इसका जवाब आपको उन पुरुषों के व्यवहार में मिलेगा जो प्रेम को अपनी उपलब्धि समझते हैं । जो किसी स्त्री के साथ बिताए गए निजी पलों को अपने “अहंकार” की ट्रॉफी बना कर बाजार में टांग देते हैं । जो यह मान बैठते हैं कि अगर कोई स्त्री कभी उनसे “प्रेम” कर बैठी थी, तो उसकी “स्मृतियों” पर भी उनका “मालिकाना” हक है । यही कारण है कि बहुत से “अभिनेताओं” से जब उनके प्रेम प्रसंगों को लेकर जब सवाल पूछे गए तो उन्होंने कहा कि…अब रहने दीजिए, वो सिर्फ एक अच्छी यादें हैं । यह सुनकर लगता है कि प्रेम की सबसे बड़ी भाषा शायद “मौन” ही होती है । प्रेम अगर सचमुच प्रेम रहा हो तो उसमें “प्रदर्शन” नहीं होता । उसमें “नीलामी” नहीं होती । उसमें पुराने संदेशों, तस्वीरों और निजी पलों का हिसाब नहीं रखा जाता । प्रेम कोई “प्रेस कॉन्फ्रेंस” नहीं है । प्रेम दो लोगों के बीच की वह “नदी” है जिसे दुनिया की नजरों से बचाकर बहने दिया जाता है ।
जब कोई पुरुष किसी “स्त्री” के साथ बिताए निजी पलों को सार्वजनिक करता है…तो वह दुनिया को यह नहीं बता रहा होता कि उसने “प्रेम” किया था..बल्कि वह दुनिया को यह बता रहा होता है कि वह “प्रेम” के योग्य नहीं था । प्रेम का सबसे बड़ा गुण “विश्वास” है…और विश्वास का मतलब यही होता है कि “रिश्ता” खत्म हो जाए…”रास्ते” अलग हो जाएं…बातचीत “बंद” हो जाए…लेकिन फिर भी जो बातें दो लोगों के बीच थीं…वो दो लोगों के बीच ही रहें…और उन्हें “हथियार” न बनाया जाए । लेकिन कुछ लोग “प्रेम” नहीं करते, “संग्रह” करते हैं…वे “रिश्ते” नहीं जीते… “सबूत” जमा करते हैं । और जब रिश्ता खत्म होता है तो वे उन सबूतों को लहरा-लहरा कर दुनिया को बताते हैं कि देखो…कभी यह स्त्री मेरे साथ थी । इससे बड़ी “दरिद्रता” क्या होगी ? क्यों “डफर खान”…सही है न !
सोचिए, अगर हर स्त्री को यह डर हो कि आज जो वो “प्रेमपत्र” लिख रही है…कल वही आदमी उन पत्रों को “सोशल मीडिया” पर डाल देगा ! आज जो तस्वीर वह विश्वास में भेज रही है…कल वही तस्वीर उसकी “बेइज्जती” का माध्यम बन जाएगी । आज जो बात वह अपने दिल की गहराइयों से कह रही है…कल वही बात किसी “इंटरव्यू” या पोस्ट का मसाला बन जाएगी…तब कौन लड़की निडर होकर प्रेम करेगी ? तब मिलेंगी लखनऊ की “सफलता पाठक” जैसी धंधेबाज महिलाएं !
पुरानी फिल्मों में “खलनायक” प्रेम पत्रों को “पब्लिक” कर देने धमकी देता था । कहता था कि सबके सामने पढ़ दूंगा । लड़की काँप जाती थी । हमें लगता था कि यह सिर्फ फिल्मों की कहानी है…लेकिन समय ने दिखा दिया कि फिल्मों के “खलनायक” मरते नहीं… सिर्फ उनके कपड़े बदल जाते हैं । आज “प्रेम चोपड़ा” स्क्रीन पर नहीं है… लेकिन उसकी मानसिकता आज भी जिंदा है । फर्क सिर्फ इतना है कि अब हाथ में “प्रेमपत्र” नहीं..बल्कि “मोबाइल” फोन है । अब मोहल्ले की चौपाल नहीं बल्कि “सोशल मीडिया” है । अब फुसफुसाहट नहीं….वायरल पोस्ट हैं । और फिर समाज हैरान होता है कि लड़कियां खुलकर प्रेम क्यों नहीं करतीं ? क्यों डरती हैं ? क्यों अपने रिश्तों को छिपाती हैं ? क्यों हर समय “आशंकित” रहती हैं ? वे इसलिए डरती हैं क्योंकि उन्होंने बार बार देखा है कि “प्रेम” में हारने वाला पुरुष अक्सर “गरिमा” नहीं बचाता । वह “बदला” लेता है । वह “अपमानित” करता है । वह यह साबित करने में लग जाता है कि अगर वह “स्त्री” उसकी नहीं हुई…तो कम से कम उसकी “निजता” भी सुरक्षित नहीं रहेगी ।
इसलिए लड़कियां “प्रेम” से नहीं डरतीं बल्कि लड़कियां “प्रेम” के नाम पर मिलने वाले “विश्वासघात” से डरती हैं…वे “प्रेम” से नहीं बल्कि “प्रेम चोपडों” से डरती हैं…वे प्रेम सफर की “थकान” से नहीं बल्कि “डफर खान” से डरती हैं …वे उस दिन से डरती हैं जब कोई पुराना प्रेमी उनकी “मुस्कान”…उनकी “तस्वीर”…उनके “संदेश” और उनकी “यादों” को अपने घायल “अहंकार” की “राख” में झोंक देगा ।
इसलिए कहते हैं कि प्रेम में सबसे सुंदर शब्द “मैं तुमसे प्यार करता हूं”…नहीं है ! बल्कि सबसे सुंदर शब्द है “तुम निश्चिंत रहो” !मतलब भरोसा…! आस पास घटी एक घटना को सामने से देखा और महसूस किया तो प्रेम पर “लेक्चर” लिख डाला ! बहुत हुआ..लेक्चर…इसलिए अब चलता हूँ…क्योंकि मुझे “बदहवास गुप्ता” की दुकान से “तेजपत्ता” और “सूखा मिर्चा” लेना है !

