पत्रकार साहब ने अपनी वॉल पर उठाया सवाल…जवाब मिला कि पत्रकारिता भवन में स्याही नहीं…साज़िशें बह रही थीं !

नीचे लिखी गयी पंक्तियाँ पत्रकारिता में वर्षों का अनुभव रखने वाले एक ऐसे पत्रकार महोदय की हैं…जिनका विवादों से शायद ही कभी कोई वास्ता रहा हो । यदि उनके स्वभाव और लेखन को गौर से देखा जाए…तो साफ महसूस होता है कि वे शोर नहीं करते…बल्कि परिस्थितियों का शांत मन से मंथन कर समाधान खोजने में विश्वास रखते हैं । कुछ दिन पहले उनके द्वारा अपने फेसबुक वॉल पर लिखी पंक्तियाँ केवल शब्द नहीं, बल्कि वर्तमान में गोरखपुर के पत्रकारिता भवन की विसंगतियों से सीधा संवाद करती हुई प्रतीत होती हैं । पहले नीचे उनकी लिखी पंक्तियाँ को पढ़िए !

शिक्षक, अधिवक्ता, डॉक्टर और पत्रकार और ऐसे तमाम पेशे और इन पेशों से जुड़े लोग ‘स्व’ ही नहीं ‘सर्व’ हित की भावना से भी भरे रहते हैं । अपने-अपने पेशे में रहकर ‘सर्वहित’ में काम करते हैं । यदि इनमें से किसी भी पेशे का कोई व्यक्ति कुछ गलती करता है या उससे गलती हो जाती है तो क्या उस पेशे से जुड़ा हर शख्स गुनाहगार हो जाएगा ! या सभी को गुनाहगार मान लिया जाएगा ! क्या उस पेशे को ही भला बुरा कहना ठीक है ! क्या यह मान लेना ठीक है कि उस पेशे से अच्छे लोग नहीं जुड़े हैं ! क्या उस पेशे से जुड़ना गुनाह है ! क्या पेशे के प्रति इमानदार लोगों भी बेइमान मान लिया जाएगा ! यदि नहीं…तो फिर किसी दो के बीच शुरू हुए विवाद में दो पेशों और उनसे जुड़े हजारों पर सवाल खड़े कर देना क्या उचित है! विचार होना चाहिए ।

बगैर लाग लपेट के कहूँ तो पत्रकार साहब की यह पँक्तियाँ सवाल मुझसे भी पूछ रही हैं । इन पंक्तियों को पढ़कर पहली दृष्टि में यही प्रतीत होता है कि बात काफी हद तक सही भी है और संतुलित भी । किन्तु समस्या तब खड़ी होती है पत्रकार साहब…जब गलती किसी एक व्यक्ति की न होकर पूरे कुनबे की आदत बन चुकी हो ! जब कुएँ में पानी नहीं..बल्कि भांग घुल चुकी हो ! जब पेशे की आड़ में बैठा एक गिरोह अपने प्रभाव, पहुँच और तंत्र का इस्तेमाल न्याय, प्रतिष्ठा और सत्य…तीनों की हत्या करने में लगा चुका हो..तो चुप्पी घातक हो जाती है । मुझे ऐसा लगता है कि आपकी इन पंक्तियों का इशारा और किये गए सवाल का सीधे तौर पर सम्बंध उन लोगों से हैं.. जिनके मन मे आज पत्रकारिता भवन को लेकर घोर संशय ने अपना स्थान बना लिया है । और यह अचानक से बिल्कुल भी नहीं हुआ..बल्कि ये पाप का घड़ा बूंद बूंद कर भरा है । मैं जानता हूँ कि आप आज की परिस्थितियों से आहत हैं..और सिर्फ आप ही नहीं बल्कि हर वो प्रबुद्ध जन आज आहत हैं जिन्होंने पत्रकारिता भवन को अपने पत्रकारिता के लहू से सींचा था । लेकिन जरा गौर कीजियेगा कि इन परिस्थितियों ने आखिर यह विकराल रूप क्यों धारण किया ? चलिए,थोड़ा विस्तार से समझिए पत्रकार साहब !

यह बात उस दौर की है जब शहर के वर्तमान एसएसपी साहब इसी जनपद में एसपी सिटी हुआ करते थे । उसी कार्यकाल में उन्होंने अपनी आँखों से पुलिस मीडिया सेल के व्हाट्सएप्प ग्रुप के भीतर वह दृश्य देखा था…जहाँ तथाकथित “बड़े पत्रकारों” का एक अहंकारी झुंड एक नए और अकेले पत्रकार को कुचल देने पर आमादा था । अपराध सिर्फ इतना था कि उस नए पत्रकार ने उनके सामूहिक अहंकार के सामने घुटने टेकने से इंकार कर दिया था । परिणाम यह हुआ कि पुलिस मीडिया सेल में चल रही खुली बहसबाज़ी को रोकने के लिए उसी समय उसे “ओनली एडमिन” कर दिया गया… और विडम्बना देखिए, वह स्थिति आज तक कायम है ।

लेकिन अपने संपर्कों और पहुँच के नशे में चूर उस मतवाले झुंड को यह अपमान बर्दाश्त नहीं हुआ । फिर शुरू हुआ मुकदमों का खेल ! लोगों को खड़ा कर उस पत्रकार के खिलाफ बगैर किसी सबूत के फर्जी शिकायतें लिखवाई गयीं… और उन्हीं शिकायतों को अगले दिन अखबारों में ऐसे सजाकर छापा गया जैसे कोई संगठित मीडिया ट्रायल चल रहा हो । उन्हें लगा था कि अखबार की स्याही किसी की आवाज़ को दफन कर देगी…लेकिन हुआ उल्टा ! जवाब मिला…और ऐसा मिला कि कमीशनबाज़ी पर पल रहे उनके कई अड्डों की नींव तक हिल गयी । जब पेट पर चोट पड़े…और जब दलाली की दुकानें डगमगाने लगे तो सबसे पहले इंसान का जमीर बिकता है ।

इसलिए गिरोहबंद कलम के सौदागरों ने अपनी रणनीति बदली और कुछ समय बाद इस गिरोह ने पुलिस अधिकारियों के कान भरने शुरू किए । एक आईपीएस अधिकारी को बरगलाया गया…उनके अहम को कुरेदा गया और उसका इस्तेमाल किया गया । उस पत्रकार को ऐसे मुकदमे में जेल भेजवा दिया गया जिस मुकदमे में उसका कोई नाम तक नही था । न कोई सबूत और न कोई गवाह फिर भी अपने हाथ लगी कामयाबी को देखकर गिरोहबंद कलम के सौदागरों को लगा..जैसे खेल समाप्त हो गया । लेकिन असल में कहानी वहीं से और भयावह हो गयी । उस वक्त अत्याचार और अनाचार का एक पूरा का पूरा तंत्र अपने अहंकार और कदाचार की पराकाष्ठा में डूबे हुए रावण की तरह अट्टाहास कर रहा था….और परिस्थितियां सहमी हुई किसी मूकदर्शक की मानिंद नियति को निहार रही थी ।

जेल भेजने से पूर्व पत्रकार पर हिस्ट्रीशीटर की कार्यवाही की गई और जेल भेजने के बाद पत्रकार पर गैंगस्टर लगवाया गया । जिस पर पारिवारिक विवाद के अलावा कोई मुकदमा नहीं था उसे अचानक से हार्डकोर अपराधी साबित करने के लिए अपनी औकात से ज्यादा कसरतें की गईं । घर की बिजली कटवाई गयी । मकान पर नोटिस चस्पा करवाया गया । गाँव तक संपत्ति की जाँच कराई गयी । जीप से टक्कर मारकर तीन दिन अस्प्ताल ने भर्ती कराया गया और जेल भेज दिया गया । और इन सबको कुछ अखबारी दरबारियों ने ऐसे छापा…जैसे किसी इंसान की बर्बादी पर आश्वस्त होकर विजय उत्सव मनाया जा रहा हो । उस सुनियोजित मानसिक उत्पीड़न का परिणाम यह हुआ कि उस पत्रकार की मानसिक रूप से अस्वस्थ पत्नी ने आत्महत्या जैसा आत्मघाती कदम उठा लिया । अब आप ही बताइए पत्रकार साहब… क्या ऐसी घटनाएँ समय के साथ भुला दी जाती हैं ? नहीं… बिल्कुल नहीं ! गलतियाँ माफ की जाती हैं पत्रकार साहब…लेकिन गुनाह नहीं ! ऐसी घटनाएँ इतिहास बनती हैं और बनाती है… और साथ में यह इतिहास ब्याज सहित हिसाब माँगता है । इतनी कसरतों और जाँचों के बाद भी हासिल क्या हुआ ? क्या उस पत्रकार के खिलाफ एक भी ऐसा कुछ मिला जिसपर प्रश्न उठाया जा सके ! उल्टा आज वह पत्रकार इस मामले से जुड़े हर एक शख्स समेत खुद अपनी भी SIT और CBI जाँच की माँग लिए सुप्रीम कोर्ट जाकर बैठा है । क्या गिरोहबंद कलम के सौदागरों में वो हिम्मत है जो इस जाँच का समर्थन कर सकें ?

आज जो व्यक्ति हर झूठे मुकदमे, हर उत्पीड़न, हर साजिश और हर आतंक के बाद भी बेदाग खड़ा होकर उसी व्यवस्था की आँखों में आँख डालकर सवाल पूछ रहा है…तो उसे वहाँ तक पहुँचाने में किसी एक या दो व्यक्ति का नहीं.. बल्कि पत्रकारिता के इस पूरे संगठित झुंड का योगदान है । और विडम्बना देखिए…कि इनके खिलाफ प्रमाण भी मौजूद हैं… मुकदमे भी मौजूद हैं… और उन्हीं प्रमाणों के आधार पर हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक कार्यवाहियाँ भी लंबित हैं । यकीन न हो तो अपने संगठन के सम्मानित पदाधिकारी पांडेय जी से ही पूछ लीजिए ! वो आपको बताएंगे कि अनाचार का फोड़ा फूट चुका है…और उसमें से मवाद फफक कर बह रहा है । वो आपको बताएंगे कि हालात अमावस की रात से भी ज्यादा काले है…और पत्रकारिता भवन के साथ ही उसके सौदागर और उसके मसीहा पूरी तरह निर्वस्त्र हो चुके हैं ।

जब कमजर्फ लोग हर मोर्चे पर हारने लगते हैं…तब वे अंततः चरित्रहनन का रास्ता चुनते हैं पत्रकार साहब ! और वही हुआ भी ! पत्रकारिता के नाम पर बैठा यह गिरोह इतना पतित हो गया कि इसने एक आपराधिक मानसिकता वाले जाहिल मुतवल्ली के सामने अपनी पूरी पेशागत गरिमा को गिरवी रख दिया । सिर्फ इसलिए कि उस पत्रकार पर फर्जी गैंगरेप का मुकदमा लिखवाकर उसकी सामाजिक हत्या की जा सके । अब प्रश्न यह है पत्रकार साहब कि यदि पत्रकारिता इस स्तर तक गिर सकती है…तो फिर सड़क पर ग्राहकों का इंतजार करती वेश्यायों और प्रेस भवन में बैठे दलालों में अंतर क्या बचता है ? एक वेश्या तो फिर भी सिर्फ अपने शरीर का सौदा करती है…मगर अपने जमीर को साफ बचाकर ले जाती है…लेकिन पत्रकारिता भवन की कुर्सियों पर जमे इन गिरोहबाजों ने तो अपना जमीर, आत्मसम्मान और पेशागत ईमान सब कुछ बेच डाला । सुपारी लेकर यूपी की सीमाएँ पार की गयीं… हरियाणा बिहार तक यात्राएँ हुईं…सिर्फ इसलिए कि एक पत्रकार को फर्जी गैंगरेप मुकदमे में फँसाकर उसकी प्रतिष्ठा कुचल दी जाए । इस घटियाई के सबूत और प्रमाण अब सब कुछ सामने हैं पत्रकार साहब…और फिर भी आप कहते हैं कि “एक-दो लोगों की गलती से पूरे पेशे को बदनाम मत कीजिए”।

कैसे न किया जाए पत्रकार साहब ? ये घटिया साजिशें उसी भवन में जन्म लें….इन्हें संरक्षण उसी भवन से मिले…योजनाएँ उसी छत के नीचे बनें…और फिर उम्मीद की जाए कि हम “बुद्धम शरणं गच्छामि” का जाप करते रहें ? गौर से देखिए कि इस बार पत्रकारिता भवन की कुर्सियों पर काबिज इस दौर के छद्म भेषधारी पत्रकारों ने पत्रकारिता को इतना मैला कर दिया है पत्रकार साहब…कि कभी कभी तो तारकोल भी इनसे कहीं ज्यादा उजला नज़र आता है ।

आखिर क्या छोड़ा है इस झुंड ने ? क्या प्रमाण देखना चाहेंगे आप पत्रकार साहब ? क्या आप उन ऑडियो रिकॉर्डिंग्स को सुनना चाहेंगे…जिसमे उस पत्रकार पर रासुका लगवाने की योजनाएँ आपके पत्रकारिता भवन में बैठे गलीज लोग बना रहे थे…या फिर
आप वह बातचीत सुनना चाहेंगे…जिसमें हिस्ट्रीशीटर की कार्रवाई कराने की रणनीति आपके इसी पत्रकारिता भवन में बैठकर तय हो रही थी ? क्या आप वह संस्वीकृतियाँ सुनना चाहेंगे…जिसमें उस पत्रकार पर गैंगस्टर लगवाने पर ये दलाल खुद को अवार्ड दिए जा रहे थे…या फिर वह आवाज़ें सुनना चाहेंगे…जिसमे उस पत्रकार के परिवार को जान से मरवाने की धमकियाँ दी जा रही थी ? क्या वो आवाज नहीं सुनना चाहेंगे…जिसमे पत्रकारिता भवन के नगीने आपस मे बात करते हुए रिकॉर्ड हुए थे कि उस पत्रकार की वजह से सारा धंधा चौपट हो रहा है..या फिर वो अंदाज-ए-बयां सुनना चाहते हैं जिसमे आपके पत्रकारिता भवन के दलाल लड़कीबाजी कैसे कर रहे थे ! और सबसे बड़ा सत्य तो यह है पत्रकार साहब…कि इतना सब कुछ कर लेने के बाद भी आज वही झुंड सबसे अधिक असहज और सबसे ज्यादा भयभीत भी है । जानते हैं क्यों ? क्योंकि उनकी औकात अब इतनी भी नहीं बची कि उस पत्रकार को सामने बैठाकर दो सवाल पूछ लें…उससे फोन पर बात कर लें… या उसके कैमरे के सामने बैठकर उसके सवालों का जवाब दे दें ! उनसे कहिए कि सिर्फ फेसबुक पर अपने पितरों की फोटो लगाकर उन्हें याद करते रहें..! इस बेगैरत झुंड से जब कुछ नहीं करते बना तो आज यह बेगैरत झुंड उस पत्रकार के पारिवारिक मुकदमें की बुझ चुकी लालटेन में उम्मीदों का अंश तलाश रहा है । ये जाहिल यह भी नहीं जानते कि जिनके पास ये उम्मीदों का अंश तलाशने निकले हैं…वो लोग अपनी गर्दन को कानूनी शिकंजे से बचाने के लिए खुद ही जद्दोजहद कर रहे हैं । क्या इतना सब कुछ सामने होने के बाद भी… आप पत्रकारिता भवन के न धुल सकने वाले दाग को पक्षपात के लैक्टोमीटर के सहारे नाप जोख कर मक्कारी और मरदूदगी की क्वालिटी चेक कर रहे हैं ? कुछ सत्य ऐसे होते हैं पत्रकार साहब..जो तलवार की तरह गर्दन पर लहराते रहते हैं और फिर भी वो नज़र नहीं आते ! यहाँ भी कुछ ऐसा ही है

इन परिस्थितियों में आपका चिंतित होना स्वाभाविक है पत्रकार साहब ! लेकिन चिंता यदि उस सड़े हुए तंत्र को बचाने की हो…जिसने पत्रकारिता को मिशन नहीं बल्कि कमीशन का धंधा बना दिया हो…तो वह चिंता न्यायोचित नहीं कहलाएगी । इस समाज और लोकतंत्र को ऐसे दलाल पत्रकारों की कत्तई आवश्यकता नहीं है…जिनका आत्मसम्मान हरम में पलने वाली वेश्यायों की चौखटों पर और अपराधियों के कदमों में बिछा हो । हाँ, एक बात बिल्कुल स्पष्ट है कि पत्रकारिता भवन में बैठा हर व्यक्ति इस झुंड जैसा बिल्कुल भी नहीं है । आज भी वहाँ ऐसे लोग मौजूद हैं जिनकी गरिमा, मर्यादा और ईमानदारी का सम्मान वर्षों से किया जाता रहा है । लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सत्य है कि कानून केवल अपराधी को ही नहीं…बल्कि अपराधी को संरक्षण देने वालों को भी कठघरे में खड़ा करता है । और इसलिए ही इस मतवाले झुंड को संरक्षण देने के लिए संरक्षण दाताओं को भी कठघरे में खड़ा होना होगा..औऱ जवाबदेह भी होना होगा । याद रखिये कि जब व्यवस्था सड़ने लगती है… तो सबसे पहले उसकी दुर्गंध किसी के शब्दों में विद्रोह स्वरूप उतरती है । इसलिए अब पत्रकारिता की आड़ में मक्कारियत की चादर ओढ़े उन मक्कारों को यह समझना होगा कि सत कर्म और असत कर्म दोनो कहीं नहीं जाते ! वे नियति की मार से क्षत विक्षत होकर राजनीति के सारे विद्रूप समीकरणों को किसी रोज़ गिद्ध की तरह से उठा ले जाते हैं ! सो अब उस नियति से डरना होगा…क्योंकि उसकी आहट दिनो दिन तेज़ होती जा रही है !

By systemkasach

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