गोरखपुर : आज की पोस्ट का आरंभ यहाँ कुछ ऐसी कुछ लाइनों से किया जा रहा है जिन्हें हिंदी व्याकरण की भाषा में द्विअर्थकता या फिर श्लेष कहा जाता है । उदाहरणतः वाक्य यह आता है…कि राजीव ने जहाज को “उड़ाया”…तो भावनाएं कुछ और बयाँ करती हैं.. लेकिन जब कहा जाए कि “रहमतुल्लाह” ने जहाज को उड़ाया…तब भावनाएँ “आहत” होने लगती हैं । इसलिए यह पोस्ट “अर्थ” का “अनर्थ” करने वाले चंद उन लोगों के नाम है जो लोग पूरी “बेहयाई” और निर्लज्जता के साथ आंखों में आंखे डालकर अपने आपको इज्जतदार बताते फिरते हैं..जबकि सामने आए सबूत कहते हैं कि..ये समाज के वो “बेगैरत बदकिरदार” हैं…जिनके साथ चाय का प्याला शेयर करना भी “तौहीन-ए-अज़मत” है ।
जब गुनेहगार कानून से नहीं बच पाते…तो अक्सर वो आस्था की ऊँची दीवारों के पीछे पनाह तलाशने लगते हैं…और ठीक यही खेल आज तक उस पाक और मुकद्दस दरगाह की आड़ में खेला जाता रहा… जहाँ अकीदतमंदों ने रूहानियत के चराग़ रौशन किए थे। जी हाँ…हम बात कर रहे हैं गोरखपुर की उस पाक और मुकद्दस दरगाह की… जिसकी आड़ लेकर एक नापाक हाथ अब तक अपने गुनाहों…अपने नापाक मंसूबों और अपने काले खेल को अंजाम देता रहा । साथ ही बात उन गलीज़ लोगों की भी हो रही है…जो पत्रकारिता का चोला पहनकर इस पूरे खेल में हिस्सेदार बने रहे और अपने ज़मीर का सौदा करते रहे ।
गोरखपुर का चर्चित हनीट्रैप प्रकरण अब उस मोड़ पर पहुँच चुका है….जहाँ कहानी में शामिल किरदार, उनके अन्तर्राज्यीय कनेक्शन और मुकद्दस जगहों की आड़ में रचा गया कथित खेल अब धीरे धीरे बेनकाब होता जा रहा है । जो लोग अब तक खुद को बेगुनाह साबित करने में लगे थे…अब वही अदालत में जाकर रहम की दुहाई देते फिर रहे हैं कि…उनके खिलाफ इस घटियाई की दूसरी FIR दर्ज न की जाए ।
इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा मोड़ तब आया….जब पेशेवर औरतों के जरिये बलात्कार के फर्जी मुकदमे दर्ज कराने वाले गिरोह के खिलाफ थाना चिलुआताल अज्ञात अभियुक्तों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया । इस दर्ज मुकदमे की घटनाओं से अब तक लगातार अपनी संलिप्तता से इनकार कर अपने आपको बेहद अहले दर्जे का शरीफ बताने वाला…दरगाह शहीद मुबारक खां के मुतवल्ली इक़रार अहमद के सामने अब ऐसी स्थितियां अनं पडीं कि…अब वह भागकर खुद ही अदालत पहुँच गया । अदालत पहुँचा इक़रार अहमद यह स्वीकार कर बैठा कि थाना चिलुआताल में अज्ञात के रूप में दर्ज हुआ मुकदमा उसी के खिलाफ है । और यह तब संभव हुआ… जब सिस्टम वेबसाइट मीडिया द्वारा हाईकोर्ट के आदेश, अन्तर्राज्यीय कनेक्शन और उपलब्ध सबूतों को आधार बनाकर अदालत से मामले के गहन जांच की मांग की गई!अदालत ने इस पूरे प्रकरण को कोई मामूली विवाद मानने के बजाय,एक बेहद संगीन और सम्भावित अन्तर्राज्यीय गैंग से जुड़ा मामला मानते हुए जांच के आदेश जारी कर दिए । देखें आदेश PDF !
विश्वस्त सूत्रों के अनुसार…पहले इक़रार अहमद ने अपने संरक्षणदाता पत्रकारों के जरिये जांच को प्रभावित करवाने की भरपूर कोशिश की । लेकिन जाँच अधिकारी की स्पष्ट रिपोर्ट देखकर इक़रार अहमद और उसके पैरविकारों के होश फाख्ता हो गए । देखें रिपोर्ट PDF !
जब हर कोशिश नाकाम होती दिखाई देने लगी… तब अचानक वह खुद अदालत में हाज़िर हो गया और कहने लगा कि उसके खिलाफ इस घिनौने मामले में पहले से मुकदमा दर्ज है… लिहाज़ा दूसरी FIR न लिखी जाए । जिस थाने की जांच से अब तक इक़रार अहमद भागता फिर रहा था… आखिरकार जांच वहीं पहुँच गई और जांच अधिकारी इस मामले में सबूत उपलब्ध कराने हेतु कई लोगों को नोटिस जारी कर चुके हैं । ऐसी ही एक नोटिस सिस्टम वेबसाइट मीडिया को भी प्राप्त हुई । नीचे देखें नोटिस PDF !
सिर्फ इतना ही नहीं…बल्कि विश्वस्त सूत्रों के अनुसार इस पूरी साजिश में शामिल उन लोगों के नाम भी अब सामने आने लगे हैं… जिनके जरिये दूसरे राज्य की पुलिस की मुहर, जीडी और अन्य दस्तावेजों की कथित कूटरचना करवाई गई थी । सूत्रों का दावा है कि इस पूरे खेल में अब तक इक़रार अहमद का सहयोगी बना रहा गुर्गा नदीम भी अब उसका साथ छोड़कर सरकारी गवाह बनने की राह पर है । यही गुर्गा नदीम अब तक कथित तौर पर इक़रार गैंग की मदद करता रहा था । देखें इक़रार के साथ गुर्गे नदीम की तस्वीर !

कहानी का सबसे ख़तरनाक हिस्सा !
लेकिन कहानी का सबसे ख़तरनाक और शर्मनाक हिस्सा अभी भी बाकी था । अदालत के आदेश के बाद अचानक कुछ ऐसे चेहरे भी सामने आने लगे… जिन पर अवाम को पहले से शक तो था… लेकिन अब वह शक यक़ीन में बदलता दिखाई देने लगा है । इक़रार के कथित कुकर्मों में साथ देने वाले ये चेहरे कोई और नहीं… बल्कि पत्रकारिता की आड़ में पल रहे वही गलीज़ लोग बताए जा रहे हैं… जो पर्दे के पीछे रहकर इक़रार के कथित गैरकानूनी और नापाक कामों को संरक्षण देते रहे… और बदले में दलाली की रोटियाँ सेंकते रहे । कोर्ट के आदेश के बाद पत्रकारिता का चोला पहनने वाले इन दलालों की बेचैनी उस वक्त खुलकर सामने आ गई…जब कोर्ट से जांच का आदेश कराने वाले वादी को पेट्रोल डालकर ज़िंदा जला देने की धमकी सोशल मीडिया हैंडल्स के जरिए दी जाने लगीं ।
जब इन धमकियों का भी कोई असर नहीं पड़ा… तब धीरे-धीरे यह भी सामने आया कि डर, धमकी, भीड़ और दबाव की राजनीति इन लोगों के लिए कोई नई चीज़ नहीं… बल्कि यही उनका पुराना हथियार रहा है… जिसके जरिये कथित तौर पर लोगों को खौफज़दा कर अब तक चुप कराया जाता रहा है । इक़रार अहमद के समर्थन में वादी को जलाकर मार देने की धमकी देने वाले सोशल मीडिया हैंडल्स की पहचान जफर खान, फैय्याज खान और सुभाष गुप्ता के रूप में हुई है । देखें इक़रार,जफर,फैय्याज औऱ टोपी परिवर्तित करने वाले सुभाष गुप्ता की तस्वीर !

सबसे अहम बात यह है कि इन नामों के सामने आने के बाद जर्नलिस्ट प्रेस क्लब एक बार फिर जिल्लत और शर्मिंदगी के आगोश में झूलता दिखाई देने लगा है । क्योंकि सुभाष गुप्ता और फैय्याज अहमद को जर्नलिस्ट प्रेस क्लब गोरखपुर का सदस्य बताया जाता है… जबकि जफर खान खुद को स्वयंभू पत्रकार घोषित कर इन सबकी जी हुजूरी करता फिरता है । घटियाई और बेशर्मी के इतने गहरे राज खुलने के बाद अब हालात बदल चुके हैं । प्रेस क्लब से लेकर पुलिस तक…और समाज से लेकर अपने सगे रिश्तेदारों तक…सबने इन बदकिरदारों से किनारा करना शुरू कर दिया है । जब इन लोगों की हालत “धोबी के खच्चर” जैसी हो गई…तब एक नया शिगूफा गढ़ा गया । जफर, फैय्याज और सुभाष गुप्ता ने कचहरी परिसर में वास्तविकता से अनजान कुछ मुस्लिम अधिवक्ताओं को बरगलाया… और वादी को फर्जी अधिवक्ता बताकर उसी कचहरी परिसर में उस पर हमले की कथित प्लानिंग शुरू कर दी गई । लेकिन इस बार भी बदकिस्मती इनके साथ ही रही और हमले की पूरी पटकथा…वीडियो सहित लीक हो गई । सोशल मीडिया ग्रुपों में हुई चैटिंग…हमले की कथित योजना…हमले में शामिल होने वाले किरदारों की तस्वीरें…और बातचीत के रिकॉर्ड एक-एक कर सुरक्षित होते चले गए ।
अब यह मामला जिला स्तर तक सीमित नहीं रह गया है…बल्कि यह प्रकरण अब बार काउंसिल उत्तर प्रदेश से लेकर गोरखपुर अधिवक्ता एसोसिएशन तक पहुँच चुका है । साथ ही बेहद संवेदनशील क्षेत्र माने जाने वाले कचहरी परिसर में बने इस हमले की योजना के विषय में जनपद न्यायाधीश से लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट के प्रशासनिक न्यायाधीश तक को अवगत कराया जा चुका है । साथ ही यह बताया गया है कि जांच कमेटी के समक्ष उन कथित अधिवक्ताओं के नाम और चैटिंग प्रस्तुत की जाएगी… जिन्हें हनीट्रैप गैंग द्वारा अपने नापाक मंसूबों को अंजाम देने के।लिए बरगलाकर कर इस्तेमाल करने का प्रयास किया गया । यहाँ पर अभी उन तस्वीरों और चैटिंग के अंशों को नहीं दिखाया जा सकता…क्योंकि हो सकता है कि चैटिंग और तस्वीरों में दिखाई दे रहे अधिवक्ता की वेशभूषा धारण किये गए लोगों की “मॉर्फ्ड तस्वीरों” को इस्तेमाल कर फर्जी फेसबुक प्रोफाइल बनाई गई हो । इसकी संभावना इसलिए भी बढ जाती है क्योंकि इस गैंग द्वारा राजधानी पुलिस की कूटरचित मुहर और जीडी की नकल तैयार किये जाने के प्रमाण सामने आ चुके हैं । इस विषय पर लिखित पत्र का PDF नीचे देखें !
Administrative judge highcourt PDF
गैंग के खुलासे से पड़ने वाला दीर्घकालिक असर !
अब बात बिल्कुल साफ हो चुकी है कि…अब यह मामला अब सिर्फ एक हनीट्रैप गैंग का मामला नहीं रह गया है…बल्कि यह उन चेहरों के बेनकाब होने की कहानी बन चुका है… जो वर्षों से धर्म, पत्रकारिता, सामाजिक प्रभाव और खौफ की राजनीति को अपनी सबसे मजबूत ढाल समझते रहे हैं । प्रेस क्लब के सदस्य के रूप में फैय्याज अहमद और सुभाष गुप्ता समेत अन रजिस्टर्ड चेला जफर खान… जब इक़रार उर्फ धिक्कार जैसे शख्स के लिए वादी पर हमले की योजना बनाते हुए सबूत सहित धर लिए और वादी को पेट्रोल से जला कर मार देने की धमकी देने लगें…तो यह कायरता और नपुंसकता ही ऐसे प्रेस क्लब की पहचान बन जाती है..जहाँ फैय्याज और सुभाष गुप्ता जैसे गलीज लोग माइक थामे हुए पेशागत द्रोही बने बैठे हैं । चंद टुकड़ों के लिए इक़रार जैसे विधर्मी लोगों को तेल लगाने की बारंबारता का इतनी अधिकता से निर्वहन किया जा रहा था कि देश की जनता ने तेल की जबरदस्त किल्लत से जूझना शुरू कर दिया । यदि इसी तरह प्रेस क्लब में बैठा हर गलीज पत्रकार यदि अपराधियों को खुश करने के लिए इतने ही अधिक तेल का इस्तेमाल करने लगे… तो देश में तेल का संकट और भी गहरा जाएगा । हनीट्रैप गैंग के खुलासे के बाद…इस खुलासे ने प्रेस क्लब से जुड़े कुछ नकाबपोश पदाधिकारियों की प्रतिष्ठा को आमिर ख़ान की फ़िल्म ‘धोबीघाट’ बना डाला है ।

