जयकार के शोर में दबती रोजगार की पुकार…और सावन की राह में अटका हुआ भविष्य !

अभी हाल ही में हाईकोर्ट ने पुलिसिया मनमानी पर चाबुक चलाया और शांतिभंग जैसी कार्यवाहियों में जेल भेजने वाले काले अंग्रेजों की तनख्वाह से 25 हजार रोजाना के हिसाब से काटकर पीड़ित को देने का आदेश सुनाया । संदेश साफ था कि शांतिभंग जैसी कार्यवाही में मनमाना जेल भेजने की परंपरा अब महंगी पड़ेगी । दूसरी तरफ इस आदेश के इतर गोरखपुर की शाहपुर पुलिस ने जैसे हाईकोर्ट को यह जता दिया…कि 25 हजार रोजाना तो उनकी कमाई के हिसाब से बहुत छोटी रकम है ! और शायद इसीलिए पूर्वान्चल गांधी कहे जाने वाले संपूर्णानंद मल्ल को शाहपुर पुलिस द्वारा शांतिभंग में परसों जेल भेज दिया गया । एक तरफ ऐसा शांतिभंग… जिसमे पुलिस बाकायदे उन्हें घर से बुलाकर थाने पर ले जाती है और थाने से उन्हें जेल भेज देती है…तो वहीं दूसरी तरफ हरदोई के एक SDM पर हमला कर उनका सिर फोड़ दिया जाता है…लेकिन आज पाँच दिनों बाद भी SDM पर हुए हमले को लेकर कोई मुकदमा नहीं लिखा जाता ! एक तरफ ऊर्जामंत्री को उर्जाविहीन करार देते हुए एक मदमस्त नौकरशाह जनता पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त महंगाई का चाबुक चला देता है…तो दूसरी तरफ पेपर लीक जैसे मामले में पेपर लीक करने वालों से पहले …पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन करने वालों पर ही कार्यवाही कर दी जाती है । कुछ दिन पहले पेपर लीक से व्यथित होकर देश की सड़कों पर उमड़े हुए लोग सिर्फ खुद सड़कों पर नहीं थे…बल्कि उन सड़कों पर उनके टूटे हुए सपने थे…फटे हुए एडमिट कार्ड थे…कोचिंग की रसीदें थीं….उन मांओं की आंखें थीं….जिन्होंने सब बेच कर बच्चों को पढ़ाया था । उन बापों की झुकी कमर थी…जिन्होंने खुद पुरानी चप्पल पहनी लेकिन बेटे को किताब दिलाई थी ।

सड़कों पर उमड़े उस सैलाब में एक बूढ़ा आदमी भी भीड़ में खड़ा था । उसके हाथ में अपने पोते का प्रवेश पत्र था । उसने उसे ऐसे जतन से रखा था…जैसे कोई किसान सूखे में आखिरी मुट्ठी बीज बचा कर रखता है । पोता घर में था…परीक्षा टल गई थी…हल्ला मचा था कि पेपर लीक हो गया..अब जांच होगी । बूढ़ा पहली बार आसमान की ओर देख कर बुदबुदाया था… कि हमारे बच्चे क्या सिर्फ फॉर्म भरने के लिए पैदा होते हैं ?

भीड़ बढ़ती जा रही थी । हर ओर से एक ही आवाज़ आ रही थी… हमारे बच्चों को काम दो ! ये नारा नहीं था। यह उन घरों की चीख थी…जहां मांएं अब बच्चों की आंखों में नहीं देख पातीं थीं । जहां बाप खाना खाते वक्त चुप रह जाता था…क्योंकि बेटा फिर से फार्म भर कर लौटा था । जहां भाई ने देखा कि बहन ने पढ़ाई में मेडल लिया…लेकिन नौकरी किसी मंत्री के भतीजे को मिल गई थी ।

अव्यवस्था से कुपित भीड़ लगातार राजा के महल की ओर बढ़ रही थी । राजा अपनी छत पर था…हवा अच्छी चल रही थी…आसमान साफ था….रंग बिरंगी पतंगें उड़ रही थीं…राजा के साथ उसके कई प्रिय दरबारी (ब्यूरोक्रेट्स) थे । कोई मांझा पकड़ रहा था…कोई हवा का रुख बता रहा था…कोई राजा की हर काट पर ताली बजा रहा था और दूसरी तरफ सड़क पर नीचे हजारों लोग अपने बच्चों के लिए काम मांग रहे थे ।

पहले तो वह शोर महल तक पहुंचा ही नहीं क्योंकि महलों की दीवारें मोटी होती हैं । वहां जनता की चीखें आसानी से नहीं पहुंचती हैं । लेकिन जब आवाज बढ़ी…तो दरबारियों ने शोर दबाने की कोशिश की । किसी ने ढोल बजवा दिए…किसी ने नाच शुरू करवा दिया…किसी ने कहा, ये सब राष्ट्र विरोधी हैं…किसी ने कहा, विपक्ष भड़का रहा है…किसी ने कहा, इतने भी बुरे हालात नहीं हैं । कोई कह रहा था कि अगर बुरे हैं तो क्या आज हुए ? पचासों साल से यही हाल रहा…तब तो कुछ नहीं बोले ।

वैसे भी जिन घरों में महंगाई, गरीबी, बेरोजगारी घुस जाती है…वहां बहस के लिए कोई जगह नहीं बचती । वहां सिर्फ बेचैनी बचती है । इसलिए भीड़ चिल्ला रही थी कि हमारे बच्चों को शिक्षा दो.. हमारे बच्चों को काम दो…और दूसरी तरफ राजा ने अभी-अभी अपने मित्र की पतंग काटी थी ! बड़ी शानदार काट थी ! सो राजा खी-खी कर हँसा । तुर्रा तो ये, कि जिसकी पतंग कटी थी…वही सबसे ज्यादा ताली बजा रहा था । वाह महाराज…क्या काट है आपकी ? राजा को ऐसे लोग बहुत पसंद होते हैं । जो कट जाने के बाद भी ताली बजाएं ।

उसी वक्त एक दरबारी भागता हुआ आया और हांफते हुए बोला कि महाराज…भीड़ महल की तरफ बढ़ रही है । बहुत गुस्से में है । राजा ने बिना घबराए पूछा…क्या चाहिए इन्हें ? कह रहे हैं बच्चों को काम दो । अरे इतनी-सी बात ? फिर राजा ने आसमान में उड़ती हुई पतंग को देखा और बोला…इन्हें एक नया चर्च दे दो । पूजा करेंगे…भजन करेंगे…मन शांत रहेगा…! आदमी ज्यादा सोचता है.. तभी दुखी होता है । इन्हें मोक्ष की राह दिखाओ…किसी पादरी को तैयार करो…वो इन्हें समझाएगा कि संसार तो माया है । लेकिन इस बार भीड़ माया सुनने नहीं आई थी…बल्कि भीड़ चीख रही थी..कि भूख लगी है काम चाहिए ।

राजा अब धीरे-धीरे मुंडेर तक आया । नीचे लाखों आंखें उसकी ओर उठ गईं । जनता हमेशा आखिरी उम्मीद राजा से ही रखती है । उसे हर बार लगता है कि…इस बार राजा कुछ करेगा । इससे पहले तो प्राकृतिक आपदाओं का साल रहा । उसमें राजा बेचारा क्या करता ? पर अब…अब शायद बच्चों के भविष्य की बात होगी । शायद पढ़ाई और काम की बात होगी । राजा ने मांझा रख दिया था । उसने छत पर खड़े होकर हाथ उठाया । मेरे प्यारे भाइयों और बहनों…बताइए आपको क्या चाहिए ? भीड़ से आवाज आई…हमारे बच्चों को काम ! बस इतनी-सी मांग ? जनता को लगा जैसे अब कोई बड़ी घोषणा होगी । नए कारखाने खुलेंगे…भर्ती निकलेगी…परीक्षा प्रणाली सुधरेगी…पेपर लीक रोकने के लिए सख्त कानून बनेगा…दोषियों को दंड का ऐलान होगा…और युवाओं के लिए कुछ जरूर होगा ।

राजा धीरे से मुस्कुराया और बोला…थोड़ा धैर्य रखो…गर्मी बहुत है…देश के अलग-अलग हिस्सों में तापमान बढ़ रहा है । जनता बोली कि…राजन काम चाहिए । राजा बोला कि सिर्फ दो महीने रुक जाओ । इकतीस जुलाई के बाद काम ही काम है । भीड़ में हलचल हुई । कैसा काम महाराज ? राजा बोला, सावन को आने दो…फिर से कांवड़ उठाना…डीजे बजाना…यात्रा करना…लंगर खाना…सेवा करना…काम ही काम है । कुछ सेकंड के लिए पूरा मैदान चुप हो गया । फिर अचानक भीड़ से नारा उठा । राजा की जय…राजा अमर रहे । उस दिन राजा के जय जयकार के साथ बदलाव की नियती उसी क्षण फिर से हार गयी ।

देश तब नहीं हारता जब उसके पास पैसा कम हो जाए । देश तब नहीं हारता जब उसके पास हथियार कम हों । देश तब हारता है जब उसकी जनता अपने बच्चों का भविष्य भूल कर तमाशे में जयकार करने लग जाए। राजा यह बखूबी जानता था कि आदमी को बहलाने के कई तरीके हैं । कभी उसे उत्सव दे दो…कभी धर्म दे दो…कभी यात्रा दे दो…कभी नफरत दे दो…कभी शोर दे दो..और देखो कि वो अपने सवाल कैसे नहीं भूलता !

इसलिए उस रोज भी जनता भूल गई…और जिस मां ने बेटे को अफसर बनाने का सपना देखा था..अब वही बेटे के लिए केसरिया कपड़ा खरीद रही थी । जिस पिता ने बेटी के लिए नौकरी मांगी थी…अब वही कह रहा था…कि रहने दो…लड़की है…घर में ही ठीक है । जिस युवक ने रात रात भर पढ़ाई की थी…वो अब डीजे पर नाचने की तैयारी रहा था..और दूसरी तरफ राजा हंस रहा था…खी-खी-खी ! उसने एक और पतंग काटी…दरबारी फिर से ताली बजा रहे थे…नीचे भीड़ फिर जयकार कर रही थी…! उसी भीड़ में वो बूढ़ा भी खड़ा था…अपने हाथ में अपने पोते का एडमिट कार्ड लिए.. खामोश ! उसने धीरे से उस एडमिट कार्ड को मोड़ कर जेब में रख लिया । उसे समझ में आ गया था कि…इस देश में अब परीक्षा से ज्यादा जरूरी है यात्रा ! किताब से ज्यादा जरूरी झंडा ! और नौकरी से ज्यादा जरूरी है नारा !

राजा फिर से पतंग उड़ा रहा था…और प्रजा आसमान में कटती हुई अपनी ही पतंग की डोर पर ताली बजा रही थी । क्योंकि उसे इंतज़ार था सावन का ! उस सावन का ..जो कभी नहीं आता ! फिर भी उम्मीद थी कि राजा ने कहा है…काम ही काम होगा…बस सावन को आने दो !

अब कुछ लोग मुझे कोसेंगे कि इतनी जल्दी क्या थी कहानी सुनाने की ? सावन का इंतज़ार नहीं कर सकते थे ? अरे पहले आसमान से फूल तो बरस जाने देते हमारे युवाओं पर..फिर सुनाते यह कहानी !  हो जाने देते पहले मोहर्रम का मातम…हो जाने देते कहीं जश्न…सज जाने देते पहले महफिलें और निकल जाने देते पहले जुलूसों का हुजूम ! सब कुछ होगा…खुशियां होंगी..भावनाएं होंगी..आस्था होगी..डीजे होगा..नगाड़े होंगे..नारे होंगे..उन्माद होगा…बस नहीं होगा तो वो उम्मीद..जो सब ठीक होने की उम्मीद लगाए बैठी है ।

By systemkasach

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