यूपी : राम मंदिर चंदा चोरी प्रकरण में कई सौ करोड़ डकार लिए जाने के कयास लगाए जा रहे हैं…लेकिन आश्चर्य जनक यह है कि “भगवान” के साथ हुए “अन्याय” के मामले में भी एक अदद FIR अब तक नहीं हुई है । दूसरी तरफ गोरखपुर चिड़ियाघर के टिकट काउंटर से भी घपलेबाजी और लूट का ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है…जिसे देखकर लगता हैं जैसे व्यवस्था में लूट भ्रष्टाचार और अराजकता अपने “चरम” पर पहुँच चुकी है । कोई भगवान के चढ़ावे की रकम खाकर “चंपत” हो जा रहा है…तो कोई जानवरों के मुंह दिखाई की रकम ही “घोंट” जा रहा है…और बजाने वाले हैं कि इन सबके बावजूद भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस का घंटा “घनाघन” बजाये जा रहे है ।
एक बार मैंने एक राजा से पूछा था… महाराज, आप भी आदमी हैं और आपकी प्रजा भी आदमी है । फिर ऐसा कैसे होता है कि आप मौज करते रहते हैं…प्रजा दुख झेलती रहती है…और फिर भी कोई आपका कुछ बिगाड़ नहीं पाता ? लोग आपका मुंह क्यों नहीं नोच लेते ? आखिर राज चलाते कैसे हैं आप ? राजा मुस्कुराया और बोला…राज दिमाग से ज्यादा चलता है । मैंने बाजार में बहरूपिए छोड़े हैं… नचनिए छोड़े हैं…गवैए छोड़े हैं…पत्रकारिता की शक्ल में भांड छोड़े हैं…महाप्रकाण्डी विदूषक छोड़े हैं…एक से बढ़कर एक दलाल छोड़े हैं..! ये वो लोग हैं जिनके “बेहयाई” की गहराई और गिरने की सीमा को किसी भी “मापकयंत्र” से नाप पाना संभव नही है । इधर देखो ! यह इस व्यवस्था की ही खूबसूरती है !

ये ऐसी खूबसूरती है कि…सील अस्पताल खुलवाने के नाम पर आमजन का डेढ़ लाख रुपये “हड़प” कर बैठ जाने वाला..और खुलेआम सड़क पर “दारूबाजी” के नशे में “वर्दी” को अपमानित करने वाला एक “विशुद्ध” दलाल….संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले अधिकारियों के बगल में बैठकर कितनी बेहयाई से अपनी “दांत चियार” फोटो खिंचवा लेता है । “प्रेत से मिलिए” कार्यक्रम के जरिये “प्रेम” से बुलाकर “ठगी तंत्र” का “तांत्रिक” एजेंडा सेट कर लिया जाता है…और सड़क पर बिना हेलमेट के मंडराने वाली ये “प्रेतात्माएं” अपने “प्रेत क्लब” में सवाल पूछती हैं कि सड़क सुरक्षा के लिए पब्लिक को “हेलमेट” क्यों न बांटा जाए ?
गोरखपुर में खुले नालों में गिरकर मरने का सिलसिला जारी है । मगर सवाल यह उठता है कि अब ये नाला किसकी जिम्मेदारी है ?
बताया जाता है कि इसे लेकर PWD, जल निगम और नगर निगम आपस में भिड़े हुए हैं लेकिन कोई जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है । इस मामले में PWD विभाग के एक जेई “डीके सिंह” को गंभीर लापरवाही का आरोपी बताते हुए निलंबित कर दिया गया था । जांच चल रही थी और ऐसा लग रहा था कि सिंह साहब “बेहाल” कर दिए जाएंगे….मगर निलंबित होने के महज 7 दिनों के भीतर ही सिंह साहब “बेहाल” की जगह “बहाल” कर दिए गए । इसलिए “प्रेत से मिलिए” कार्यक्रम का भोंपू बजाइये ! कार्यक्रम से प्राप्त हुए “फोटू” का खुलकर “बाजारीकरण” करते हुए अपने दोनो हाथों को “अनुलोम विलोम” की मुद्दा में अपने “नासिका” पट तक ले जाइए..और फिर गहरी सांस छोड़ते हुए “मूर्धन्य व्यवस्था” का हुँकार भरा “जयघोष” कीजिये ।
हमने अपने जीवन में दो विद्याओं का बड़ा नजदीकी अध्ययन किया है । एक “नीम” और दूसरा “करैला” ! नीम को “पत्रकारिता” मान लीजिए और करैला को “कानून” ! दोनों को पढ़ने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि इन पेशों में जो आदमी धन की चाहत लेकर प्रवेश करता है…वह अंततः अपनी “आत्मा” बेच देता है । ध्यान देने की बात यहां ये है कि मैंने “चाहत” कहा है…”ज़रूरत” नहीं ! इसलिए क्योंकि “ज़रूरत” और “चाहत” में बड़ा अंतर है !वर्षों पहले पत्रकारिता पर आधारित एक पाठ्य पुस्तक में पत्रकारिता को लेकर एक लेख पढ़ा था । लिखा था कि पत्रकार के तीन गुण होते हैं । पहला यह कि…वह खबर जनता तक पहुंचाता है । दूसरा यह कि वह समाज को जोड़ता है और तीसरा यह कि…वह व्यवस्था की आंख में आंख डाल कर सवाल पूछता है । तीसरी वाली बात इतनी चल निकली कि फिल्मों में पहुंच गई…टीवी डिबेट में पहुंच गई..और राजनीतिक प्रवक्ताओं के जुबान पर भी चढ़ गई । लेकिन किसी ने यह नहीं पूछा कि आंख में आंख डालने के लिए “आंख” चाहिए या “पगार” (तनख्वाह)?
जिस पत्रकार की मासिक किस्तें उसकी कलम से बड़ी हो जाएं…वह सवाल क्या “घंटा” पूछेगा ? जिस जज का बंगला, गाड़ी, सुरक्षा, विदेश यात्रा और रिटायरमेंट के बाद का पद उसके फैसलों से जुड़ जाए…क्या वह “स्वतंत्र” रह सकेगा ? जिस टीचर की पूरी चेतना कोचिंग सेंटर की फीस में तब्दील हो जाए…क्या वह बच्चों में भविष्य का “निर्माण” करेगा ? जिस नेता की राजनीति सिर्फ चुनाव जीतने की “परियोजना” बनकर रह जाए…क्या वह जनता के लिए “लड़” सकेगा ? कार्ल मार्क्स भी एक पत्रकार थे। रिपोर्टिंग करते थे । उन्होंने अपने संपादक से सैलरी बढ़ाने की मांग की । जवाब मिला कि पत्रकार को इतनी तनख्वाह नहीं दी जाती । मार्क्स नाराज हुए और पत्रकारिता छोड़ कर राजनीति में उतर गए
आपको भी पैसों की भूख है तो पत्रकारिता छोड़ “अभिनेता” बनिए…”दलाल” बनिए…”चोर” बनिए…”व्यापारी” बनिए..पेशेवर महिलाओं का “गैंगबाज” बनिये…भ्रष्टाचार के अखण्ड साम्राज्य का “मैनेजर” बनिए…सरकारी अधिकारी बनिए…जनसंपर्क का काम कीजिए…खूब “पैसा” कमाइए…दुनिया का “सुख” भोगिए..लेकिन अगर “पैसा” ही चाहिए…तो “पत्रकार” मत बनिए…”जज” मत बनिए…”टीचर” भी मत बनिए…”सेना” में भी मत जाइए…और “पुरोहित” तथा “मुतवल्ली” जैसे पाक और पवित्र जिम्मेदारी की तरफ तो “आँख” उठाकर भी मत देखिए । क्योंकि ये पेशे नौकरी नहीं हैं बल्कि “तपस्या” हैं । और “तपस्या” में वेतन नहीं बल्कि “त्याग” चलता है ।
हर पेशे में आदमी जीने के बराबर पा लेता है..और यदि नहीं पा रहा.. तो उस बादशाह “औरंगजेब” से सीखिए..कि किस तरह राज काज चलाते हुए भी वो खुद के खर्चे के लिए “टोपियां” सिला करता था । एक तरफ सूबे के वजीर-ए-आजम ने “मोहर्रम” को लेकर फरमाया है कि “मोहर्रम” मातम का मौका है और इसमें नुमाइश नहीं चलेगी..तो दूसरी तरफ कुछ बद-किरदार ऐसे हैं जिनकी वायरल वीडियो देखकर लगता है जैसे….मोहर्रम पर मातम की नहीं बल्कि “जश्न” की तैयारी कर रहे हों ।
वीडियो में हुक्म जारी करने वाले शख्स जनाब का पूरा किरदार और जीवन ही सवालों के घेरे में रहा है । इनकी पहचान इल्म, ख़िदमत, तक़वा या अख़लाक़ से नहीं, बल्कि दूसरे ऐसे किस्म के कारनामों से रही है…जिनके कुछ तफ़सीलात वीडियो से लेकर अदालती “दस्तावेजों” तक में दर्ज हैं । अब मोहर्रम आते ही यही जनाब कैमरों के सामने खड़े होकर फरमाते हैं कि “ढोल” की धुन ऐसी होनी चाहिए जो कहीं और न बजी हो…”जुलूस” ऐसा होना चाहिए जो पूरे शहर में चर्चा का विषय बन जाए । यह सुनकर आवाम यह सोचने पर मजबूर हो जाती है कि.. आखिर “कर्बला” का पैग़ाम इन लोगों तक पहुँचा भी है या नहीं ? जिस “कर्बला” ने इंसान को ख़ुद एहतसाबी (आत्ममंथन) सिखाया…उसे हमने दूसरों को प्रभावित करने का ज़रिया बना दिया । जिस “मोहर्रम” का मक़सद ज़ुल्म के ख़िलाफ़ खड़ा होना था उसे कुछ लोगों ने अपनी सामाजिक हैसियत दिखाने का मंच बना दिया…और मोहर्रम के मातम को और उर्स की इबादत को “जश्ननुमा” माहौल में तब्दील कर दिया ।
ये हाल किसी एक धर्म का नहीं है…बल्कि आस्था के नाम पर नदियों में हजारों लीटर दूध बहा देने वाले उन लोगों का भी है…जो अपने “कुतर्कों” को “आस्था” से जोड़ते रहे हैं । हस्तिनापुर की कथा याद आती है । वही हस्तिनापुर जहां “धृतराष्ट्र” शासक थे । आंखें नहीं थीं लेकिन “सत्ता” उनके हाथ में थी । उसी राज में “कौरव” पले, बढ़े…”ऐश्वर्य” में डूबे रहे । वहां “दूध” की कमी नहीं थी । वहां दूध से “पूजा” भी होती थी..दूध “बहाया” भी जाता था और अगर मन हो तो दूध से “नहाया” भी जा सकता था । कौरवों के उस राज में भले दूध से नहाया जाता रहा हो….लेकिन हजारों बच्चे ऐसे भी थे जिन्हें “दूध” नसीब नहीं था । उनमें से ही एक था अश्वत्थामा ! गुरु द्रोणाचार्य का बेटा ! वो बहते “दूध” को देखता था ! “कौरवों” को पीते देखता था ! उसने सुना था “दूध” मीठा होता है…”स्वादिष्ट” होता है ! उसे “गोरस” भी कहते हैं । पर हाय री किस्मत ! जहां दूध की “नदियां” बहती थीं…वहीं उसके कटोरे में दूध नहीं था । एक दिन बच्चे ने मां से कहा था…मुझे भी “गोरस” दो मां ! गरीबी और बदहाली को जीती मां ने “आटा” पानी में घोला और कहा बेटा यही है “गोरस” (दूध) है ! “आस्था” जीत गई थी और हस्तिनापुर की “व्यवस्था” हार गई थी !
एक तरफ “कौरव” थे जो “दूध” बहा सकते थे..दूसरी तरफ अश्वत्थामा था…जिसे एक घूंट “दूध” नसीब नहीं था । यह अंतर तब होता है..जब शासक “धृतराष्ट्र” हो जाता है । जब शासक धृतराष्ट्र होता है तब “व्यवस्था” की आंखें बंद हो जाती हैं…समाज की “संवेदना” मर जाती है । दूध “नदियों” में बहता है और “अश्वथामा” आटे का घोल पीता है । आज भी समय सिर्फ बीता है…मगर बदला नहीं है । आस्था के नाम पर आज भी “दूध” पूजा में चढ़ता है…नदियों में बहाया जाता है…जयकारे लगते हैं…लेकिन लाखों “अश्वथामा” ऐसे हैं…जिन्हें “दूध” नसीब नहीं है । जब हजारों लीटर दूध “नदी” में बहता है तो वह सिर्फ “दूध” नहीं होता…वह हमारी सोच का “आईना” होता है । यह सिर्फ बर्बादी या अनैतिक ही नहीं है…बल्कि यह “अपराध” है । दूध पानी में जाकर सड़ता है…पानी मे “ऑक्सीजन” कम करता है..मछलियां मरती हैं…जीवन खत्म होता है…और हम “जयघोष” कर कहते हैं कि ईश्वर को “प्रसन्न” किया ।

