एक बार की बात है कि मुन्ना स्कूल की परीक्षा में फेल हो गया था । बहुत झेंपते हुए घर आया । चेहरे पर वो भाव था जो अक्सर हम सबके चेहरे पर आ जाता है…जब हम सच्चाई से बचना चाहते हैं । पिताजी ने पूछा कि क्या रहा रिजल्ट बेटा ? सवाल सीधा था..जिसका जवाब भी सीधा हो सकता था…लेकिन सच्चाई से सीधा सामना कर पाना हर किसी के बस की बात नहीं होती । इसलिए मुन्ना ने कहा कि पिताजी… सामने वाले शर्मा अंकल का बेटा फेल हो गया है । पिताजी ने तुरंत राहत की सांस ली…बोले कि अरे शर्मा जी का बेटा तो बिल्कुल आवारा है…वो कैसे पास हो सकता था ? मुन्ना ने देखा कि बात बन रही है…तो उसने एक और नाम जोड़ दिया । बोला कि हमारे ऊपर जो चिंकू रहता है न पिताजी…वो भी फेल हो गया । पिताजी ने फिर हामी भरी…बोले कि हां बेटा…चिंकू भी दिन भर पतंग उड़ाता रहता है… वो भी कैसे पास होता ? लेकिन मुन्ना यहीं नहीं रुका । उसने कहा कि पिताजी…मोनू भी फेल हो गया । पिताजी थोड़ा परेशान हुए… लेकिन फिर भी बोले कि बेटा… ज़माना ही खराब है ! सब बच्चे पढ़ाई छोड़कर इधर उधर लगे रहते हैं ! लेकिन तुम बताओ…कि तुम्हारा क्या हुआ ? मुन्ना ने सिर झुका कर कहा कि….मैं ज़माने से अलग थोड़े ही हूँ पिताजी !
बस, यही कहानी है । छोटी लेकिन सीधी सी ! लेकिन इसके भीतर जो बात छुपी है…वो बताती है कि हम सब अपने अपने हिस्से की जिम्मेदारी से बचने के लिए हमेशा कोई न कोई “शर्मा”…कोई न कोई “चिंकू”…और कोई न कोई “मोनू” ढूंढ ही लेते हैं ।
यह कहानी सीधे सीधे हमारी व्यवस्था से जुड़ी है । एक प्रमुख न्यूज़ प्लेटफार्म दैनिक भास्कर का स्टिंग ऑपरेशन बताता है कि राजनैतिक पार्टियाँ अपनी पार्टी से टिकट देने के लिए 3 से 8 करोड़ तक रुपया ले रही हैं । स्टिंग ऑपरेशन में निषाद पार्टी से लेकर सपा बसपा और ऐसी पार्टियों के नाम भी हैं जो जुमा जुमा अभी पैदा हुए हैं..और जिन्हीने अभी ठीक से चलना भी नहीं सीखा है । अब सोचिए कि जो नेता विधायक 8 से दस करोड़ खर्च कर सांसद और विधायक की गद्दी हासिल करेगा..वो लूट और डकैती नहीं करेगा तो क्या रामचंद्रमानस का पाठ करेगा ? और जब नेता लूट डकैती करेगा तो उसके सैनिक और ड्रेसधारी अंगरक्षक ईमानदार कैसे हो सकेंगे ? मतलब सीधा सा है कि नेता हो या वर्दीधारी..सब अपने अपने हिस्से की जिम्मेदारी से बचने के लिए हमेशा कोई न कोई बहाना ढूँढ़ ही लेते हैं । ख़ैर छोड़िए…क्योंकि सब जानते हुए भी “थेथरई” के सिवा आप कर भी क्या सकते हैं ? अगली बार फिर जाइयेगा और घंटो धूप में खड़े होकर अपना वोट दे आईयेगा…ताकि “मतदाता” सूची में आपका नाम सुरक्षित रहे…और “राशन” कार्ड में अमर रहे ।
बात 1857 की है ! जब एक “क्रांतिकारी” का पीछा करते हुए एक अंग्रेज अफसर और कुछ हिंदुस्तानी सिपाही एक महिला के दरवाजे पर पहुँचते हैं । क्रांतिकारी जैसे ही घर के अंदर घुसा.. वैसे ही महिला ने दरवाजे की सिटकिनी चढ़ा दी थी । अंग्रेजी अफसर चीखा…दरवाजा खोलो ! महिला ने कहा…मैं “नहा” रही हूँ । अफसर चीखा.. तोड़ दो “दरवाजा” ! हिंदुस्तानी सिपाही दरवाजे पर “राइफल” का बट मारते हैं…ठक-ठक की आवाज गूंजती है ! भीतर से आवाज आती है…कि “दरवाजा” तोड़ोगे तो अपनी बहन को “नंगा” देखोगे ! एक पल को सब “ठिठक” जाते हैं । “आदेश” और “आत्मा” के बीच एक “दरार” पड़ती है । अंग्रेज अफसर फिर चीखता है, यह मेरा “आदेश” है…दरवाजा तोड़ो ! भीतर से आवाज फिर आती है… सोच लो…मेरे “तन” पर एक भी कपड़ा नहीं है… देख पाओगे अपनी “बहन” को “नंगा” ? तभी “हिंदुस्तानी” हवलदार कहता है…हम नहीं तोड़ेंगे ! हम अपनी “बहन” को ऐसे नहीं देख सकते ! उसके साथ बाकी सिपाही भी खड़े हो जाते हैं ! “आदेश” वहीं रह जाता है…”इंसान” आगे आ जाता है । “अंग्रेज” अफसर “ढिठई” दिखाता है…तब “गोली” चलती है…”ठांय” ! अंग्रेज अफसर गिरता है ! लेकिन “कहानी” खत्म नहीं होती..बल्कि वहीं से “शुरू” होती है ।
यह “गुलाम” भारत की कहानी है…. जहां पुलिस “गुलाम” थी…लेकिन “बिकी” नहीं थी । जहां वर्दी के भीतर “इंसान” जिंदा था…जहां आदेश को भी “नैतिकता” की “चौखट” पर कसा जाता था । अब हम “आजाद” हैं ! “सत्ता” हमारी है ! “संविधान” हमारा है ! “पुलिस” हमारी है…पर सवाल यह है कि…क्या “पुलिस” भी “सच” में हमारी है ? “पुलिस” के पास काम की कोई कमी नहीं है । सड़क पर लोग “नियम” तोड़ते हैं…”अपराध” करते हैं… “चोरी” होती है…”ठगी” होती है…”घटियाई” होती है…”प्रेत” क्लब की आड़ में “बेहयाई” होती है….पेशेवर महिलाओं को “हथियार” की तरह इस्तेमाल किया जाता है…और “बच्चे” गायब हो जाते हैं…! ये सब असली “काम” हैं… इन सबके लिए “पुलिस” चाहिए…लेकिन हैरत तब होती है..जब “पुलिस” ये सारे काम छोड़कर ऐसी जगह अपनी “ऊर्जा” बर्बाद करती है…जहाँ उसके “हाथ” सिर्फ और सिर्फ “बदनामी” ही लगती है ।
बिहार में एक युवक पर पुलिस अपना “शक्ति” प्रदर्शन दिखाती है । हथियार लहरा रहे युवक को “सरेंडर” करने के लिए कहती है । युवक पढ़ा लिखा था..”हथियार” फेंक देता है । पुलिस “हथियार” फेंकने के बाद दो “गोलियां” दागती है..एक “पैर” में लगती है और दूसरी “जांघ” में ! युवक की “मौत” हो जाती है । पुलिस वाले “सस्पेंड” कर दिए जाते हैं..लेकिन बात नहीं बनती और “जनता” सड़क पर उतर जाती है । देखकर यही लगता है कि आज “पुलिस” “आजाद” है…पर क्या उसकी “आत्मा” आजाद है ? पहले “गुलामी” बाहर थी…अब कहीं भीतर तो नहीं “बस” गई ? फिल्म “मुगल-ए-आजम” में “बादशाह” ने “अनारकली” से कहा था…”सलीम” तुम्हें “मरने” नहीं देगा…और मैं तुम्हें “जीने” नहीं दूंगा ! “अनारकली” न “मर” पाई थी…और न “जी” पाई थी ! अब तो ऐसा लगता है जैसे…हम सब भी “बादशाहों” के मर्जी की “अनारकली” हैं !
भारत में “रंगभेद” है । यह वाक्य लिखते हुए अब हाथ नहीं “कांपता” ! फर्क सिर्फ इतना है कि यह रंग “चमड़ी” का नहीं है…यह रंग “दमड़ी” का है । जिसके पास ताकत है.. पैसा है..रसूख है…उसका रंग “गोरा” है । बाकी सब “काले” हैं ! और “काले” लोगों के हिस्से में आता है इंतज़ार, अपमान और एक लंबा अंतहीन “तमाशा” ! आजमाना चाहते हों तो किसी नेता विधायक मंत्री पर भ्रष्ट होने का आरोप लगाकर देखिए । सिर्फ एक “आरोप” ! “अदालत” कुछ कहे या न कहे …कोई “जांच” हो या न हो…कोई “सजा” हो या न हो…सिर्फ एक आरोप…और पुलिस “उड़” कर पहुंच जाएगी । कानून को अचानक अपनी “ताकत” दिखाने का मौका मिल जाएगा । दरवाजे टूटेंगे… लोग उठाए जाएंगे… मलमूत्र साफ करने के लिए इस्तेमाल होने वाले “प्रपंचकारी” अखबारी पन्नों में गाथाएं छपेंगी…! सनद रहे कि “पुलिस” सोती नहीं है….पुलिस जागती है… लेकिन “आवाज” पहचान कर ! अब देखिए कि गोरखपुर पुलिस जिस “मरदूद” को अब तक खुद अपने ही रिकॉर्ड में गुंडा, हत्यारा और असलहा तस्कर बताती रही है….आज वो खुद उसे बचाने में लगी है । कुछ तो “वजह” होगी..यूँ ही कोई “बेवफा” नहीं होता ! फिर भी पुलिस उस “मरदूद” को बचाने के लिए फर्जी रिपोर्ट लगाती है…लेकिन प्रमाण होते हुए भी उस “मरदूद” के खिलाफ FIR नही लिखती…कि उसने “धंधेबाज” औरतों जरिये फर्जी बलात्कार के मुकदमों की “फैक्ट्री” खोल रखी है । जब इस “दोजखी” फैक्ट्री के खिलाफ मोर्चा खोला गया…तो प्रमाण के बावजूद पुलिस खड़ी नहीं हुई…जो यह साबित करता है कि “कानून” है… लेकिन “किताब” में है…”जमीन” पर नहीं ! लोगों ने बताया, डराया समझाया… बोले जिनके खिलाफ तुम खड़े हो वो बड़े “वेश्याबाज” हैं । उनके खिलाफ शिकायत दर्ज नहीं होती…क्योंकि ऐसे कुछ मामले यूपी के अन्य शहरों से भी आये हैं…जिसमे कुछ पुलिसवालों के भी नाम जुड़े पाए गए हैं !
आज गोरखपुर का यह मामला “कोर्ट” में है…समाज और इंसानियत के जिस्म पर चिपके हुए “कोढ़ी” भी…अब थक हार कर और न चाहते हुए भी “कोर्ट” तक हांफते हुए पहुँच चुके हैं…कल यह मामला “हाइकोर्ट” जाएगा….जरूरत पड़ी तो “सुप्रीम” कोर्ट भी जाएगा….और साथ मे जाएगा हर वो “नाम”…जिसने ऐसे सामाजिक “सुवरों” को बचाने के लिये “कागज” काले किये हैं । रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि अपने “रत्नाकर काल” मे ही संदेश दे गए थे…कि पाप के “भागीदार” वो सभी होते हैं…जो उस “व्यवस्था” का हिस्सा होते हैं…या उससे “लाभान्वित” होते हैं । धन पद प्रतिष्ठा की खातिर भांति भांति का “स्वांग” रचने वाले “विदूषक” परंपरा का “निर्विवाद” चक्रवाती “सम्राट” बन चुका कोई भी व्यक्ति यह कहकर बच नहीं सकता कि…हम मजबूर थे..और हमे “ऊपर” से कहा गया था ।
देखा जाए तो यह एक “अघोषित” युद्ध है…जो समाज में विचरण करने वाले कुछ सामाजिक “सुवरों” द्वारा अक्सर निर्दोष लोगों पर थोप दिया जाता है । लेकिन इस बार “बयाना” दक्षिण दिशा से लिया गया है…इसलिए हर बार की तरह न “बंजर” में…न “चमन” में…और न ही किसी की “पनाहों” में फूट फूट कर रोना है….न ही “न्याय” के दुश्मन बन चुके कुछ “कुपात्रों” से “न्याय” की भीख मांगनी है…और न ही “नियति” के “गर्त” में तेजी से विलीन हो रही..”फरेब” की विशाल भीड़ के आगे अपनी “चेतना” को खोने देना है । मुझे यह कहने में “कोफ्त” होती है कि पुलिस निकम्मी है…क्योंकि आज भी कुछ “संवेदनशील” और “निष्पक्ष” चेहरों को वर्दी में देखकर “जबान” ऐसा कहने की इजाजत नहीं देती ।
सोशल मीडिया पर एक “वायरल” वीडियो देखिए । अभी कुछ दिन पहले की ही बात है…डीएम और एसपी साहब कह रहे थे कि “मोहर्रम” पर हथियारों की “नुमाइश” नहीं चलेगी । लेकिन “आँत” और “दाँत” विहीन “चचा” ने प्रशासन की अपील को “नजरअंदाज” करते हुए…अपनी “शमशीर-ए-सुलेमानी” निकाल ली…और “भांजना” शुरू कर दिया ।
अब कहने वाले कहेंगे कि “चचा” सड़क पर तो नहीं भांज रहे थे । अरे जनाब…जब “चचा” की “रणबांकुरई” का वीडियो तुमने पब्लिक में डाल ही दिया… तो यह मसला फिर “निजी” कैसे रह गया ? जब जिला प्रशासन ने स्पष्ट रूप से घोषणा की थी कि मोहर्रम के अवसर पर शस्त्र प्रदर्शन की अनुमति नहीं होगी…तब सार्वजनिक रूप से तलवार भांजते हुए वीडियो का प्रसारित होना क्या उस आदेश के अनुरूप माना जा सकता है ? वैसे भी “चचा” के जिस्म में लहर मार रही “सिंदबाज” जहाजी की रूह को देखकर “आवाम” और “हुकूमत” के बीच अच्छा “सन्देश” ही जा रहा होगा ! “चचा” ने तो “शमशीर-ए-सुलेमानी” इसलिए भांज दी क्योंकि…”चचा” जानते हैं कि कुछ होने जाने वाला नहीं है । अरे “चचा” इस उमर मे भी क्यूँ “खुराफात” मचाये हुए हो… “जुमाँजी” की बजाय “नमाजी” बनो ! नहीं तो जिस दिन भी “वजीर-ए-आला” की “नजर-ए-इनायत” आपके के इस “हुनर” पर पड़ गयी…उस दिन आपकी “नमाज” पढ़ दी जाएगी !
गलती “चचा” जान की नहीं है । क्योंकि “चचा” जान जानते हैं कि असली “भारत” यही है…जहां एक तरफ किसी “ताकतवर” की छींक पर पुलिस उड़कर दूसरे “राज्य” तक पहुँच जाती है…किसी सामाजिक “सुवर” को बचाने के लिए “तंत्र” तमाम “कागज” काले कर देता है….और दूसरी तरफ आम आदमी की जिंदगी बर्बाद करने के लिए अपनी पूरी “औकात” लगा देता है । आज भी यह “गोरों” का ही भारत है । हुकूमत “गोरी” है…और “प्रजा” काली ! हमारे आपके लिए यहां “न्याय” एक संघर्ष है…और उनके लिए “मजाक” ! क्योंकि पुलिस “गोरों” के लिए हथियार है…और कालों के लिए “भय” !

