एक मौत बनाम पंद्रह मौतें ! दो व्यवस्थाओं की कहानी !

भारत में उत्तर प्रदेश राज्य की राजधानी लखनऊ में एक कोचिंग सेंटर में दो दिन पहले भयंकर आग लग गई । कई स्टुडेंट्स जल कर मर गए । जिंदगी उनके सामने खुली सड़क की तरह पड़ी थी । वो बड़े हो रहे थे…सपने देख रहे थे…कुछ अपने लिए…कुछ अपने माँ बाप के लिए…कुछ अपने देश के लिए…लेकिन उन्हें क्या पता था कि उनका देश किसी क़ीमत पर बदलने को तैयार नहीं है !

दूसरी तरफ एक और हादसा ! अमेरिका में न्यूयार्क के सेंट्रल पार्क में बग्घी से गिर कर एक भारतीय छात्र की मौत हो गई । ध्यान रहे कि लखनऊ के मुकाबले यह घटना बेहद छोटी है । लेकिन यह भी
ध्यान रहे कि पिछले डेढ़ सौ साल के इतिहास में अमेरिका में पहली बार बग्घी से गिर कर किसी की मौत हुई है । लेकिन इस एक मौत के बाद अमेरिका में सवाल खड़े हो गए । नगर परिषद में बहस शुरू हो गई । लोग पूछने लगे कि अगर डेढ़ सौ साल पुरानी परंपरा एक निर्दोष की जान ले सकती है तो क्या उसे जारी रहना चाहिए ? कानून बदलने की मांग तेज हो गई । अब बग्घियों को हमेशा के लिए बंद करने की दिशा में कदम बढ़ चला है ।

यह भी सनद रहे कि मरने वाला किसी मंत्री का बेटा या भतीजा नहीं था…न कोई अरबपति था…. कोई फिल्म स्टार भी नहीं था…और तो और…वो उनके देश अमेरिका का भी नहीं था । एक साधारण भारतीय परिवार का बेटा था और एक आम आदमी था । मौत एक मनुष्य की हुई है…इसलिए पूरा शहर अपनी व्यवस्था से सवाल पूछने लगा है ।

अब हमारे देशी व्यवस्था की बात ! अपने दिल से पूछिएगा कि यहां रोज कितने लोग सिर्फ लापरवाही से मरते हैं । पुल गिरता है…लोग मर जाते हैं ! नाव पलटती है…लोग मर जाते हैं ! बस खाई में गिरती है… लोग मर जाते हैं ! अस्पताल में आग लगती है…लोग मर जाते हैं ! ट्रेन टकरा जाती है…लोग मर जाते हैं ! बिजली का तार टूट जाता है… लोग मर जाते हैं ! सीवर में उतर कर मजदूर मर जाते हैं… निर्माणाधीन इमारतें भरभराकर गिर जाती हैं..मजदूर मर जाते हैं…और स्कूल वैन पलट जाती है…बच्चे मर जाते हैं ! जैसे ये सब होता है…वैसे ही लखनऊ में कोचिंग सेंटर में आग लग गई… बहुत से बच्चे जल कर मर गए ! हम और आप ईश्वरवादी हैं । हम जानते हैं कि जीवन मरण ईश्वर के हाथ में है । फिर आदमी क्यों परेशान हो…विधि और विधाता के निर्णय पर ?

अमेरिका एक घटिया देश है । गंदे लोगों का देश ! नंगे-पुंगे का देश ! भारत परंपराओं का देश है ! अमेरिका का क्या है ? एक छात्र मर गया तो बग्घी सिस्टम की जांच होने लगी ! उसे बंद करने का निर्णय होने लगा ! ऐसे हमारे यहां एक एक आदमी की मौत का हिसाब होने लगे तो आदमी बोट पर बैठना छोड़ देगा…गटर में उतरना छोड़ देगा…बिना फायर सेफ्टी के बनी इमारतों पर ताला ही लग जाएगा ! ऐसा होगा तो व्यवस्था कैसे चलेगी..? रिश्वतखोरी कैसे चलेगी ? हरामखोरी कैसे चलेगी ? और सबसे बड़ी बात…मरना आदमी के हाथ में है क्या ? ऐसे आम आदमी की मौत को अगर इतनी गंभीरता से लेने बैठ गए तो फिर देश बचेगा क्या ? अरे मरने वालों में कोई मंत्री का बेटा था क्या ? कोई अरबपति सेठ का बेटा था क्या ? किसी बड़े नौकरशाह का बेटा था क्या ? फिर काहे की माथापच्ची ? और हर मौत के लिए शासन, प्रशासन ही दोषी नहीं होता ! लोगों को भी तो अपना ख्याल रखना चाहिए ! हर वक्त व्यवस्था को दोष क्यों देते हैं ? क्या जब पूर्व पीएम इंदिरा गांधी पर हमला हुआ था…तो तुरंत ही सिस्टम नहीं बदल गया था …? क्या उसी वक्त SPG की स्थापना नहीं हो गई थी ? क्या कुख्यात अंडर वर्ल्ड डॉन श्रीप्रकाश शुक्ला द्वारा जब सीएम की सुपारी लेने की खबर पता चली…तो स्पेशल टास्क फोर्स का गठन नहीं हो गया था ? अब आप क्या चाहते हैं ? अब आप कोई पीएम सीएम तो हैं नहीं…फिर काहे हो हल्ला मचाये हुए हैं…छापेमारी चल रही है न…दो चार दस सील होंगे और मुकदमा लिखा जाएगा न ? मुआवजा मिल रहा है न ? जिनकी बिल्डिंग में मौत नाची है और आनेवाले समय मे जहाँ भी नाच सकती है…वहां बुलडोजर पहुँच रहा है न ? अब आप क्या चाहते हैं..? यही न कि जिम्मेदार नौकरशाहों (IAS) पर कार्यवाही हो ! अब इतनी भी चाहत मत पालिये…क्योंकि शायद आप ये नहीं जानते कि IAS का मतलब क्या होता है ! IAS का मतलब होता है (I AM SAFE)…! इसलिए व्यवस्था के अवरोधक मत बनिये…क्योंकि लेन देन के वाहकों पर कार्यवाही की भावना…विशुद्ध रूप से देशविरोधी मानसिकता की परिचायक है ।

हादसे के बाद सिस्टम कैसे बदलता है…जिससे दुबारा हादसा ना हो…ये हमको और हमारी सरकार को नंगे पुंगे देश अमेरिका से सीखने की क्या जरूरत है ? अमेरिका पर 09/11 का हमला हुआ तो अमरीकी सिस्टम ने लीपापोती करने की जगह सिर्फ अपना ही सिस्टम नहीं बदला…बल्कि पूरी दुनियाँ का सिक्योरिटी सिस्टम बदल दिया । उन्होंने जाँच कमेटी का गठन नहीं…बल्कि सीधी स्पेशल ट्रांसपोर्टेशन सिक्योरिटी नाम की पूरी फ़ौज खड़ी कर दी । हवाई यात्रा के नियम ऐसे बदले कि आज 25 साल बाद भी दुनिया का बड़े से बड़ा रईस या नेता हो, उसे अमेरिकी एयरपोर्ट पर जूते उतारने ही पड़ते हैं । उन्होंने अपनी पूरी इंटेलिजेंस को एक धागे में पिरो दिया ! नतीजा यह हुआ कि उस दिन के बाद से आज तक किसी माई के लाल की हिम्मत नहीं हुई कि अमेरिका की धरती पर वैसा दूसरा हमला कर दे । इसे कहते हैं…हादसे से सबक लेना !

विमानों के कॉकपिट के दरवाजों को बुलेटप्रूफ कर दिया गया । एक ऐसा अभेद्य किला…जिसे चाहकर भी कोई बाहर से खोल न सके । जहाज अब “अभेद्य किले” बन गए हैं…जहाजों पर एक्सेस कंट्रोल इतना सख्त हो चुका है कि बिना वैलिड गेट पास या आई डी के कोई परिंदा भी पर नहीं मार सकता । मतलब पूरा सिस्टम ही बदल गया…मगर जब हादसे भारत में होते हैं तो “स्क्रिप्ट” पहले से तैयार होती है…नेताओं का दुख जताना और मुआवजे का ऐलान…आनन फानन में एक “उच्च स्तरीय” जांच कमेटी का गठन…दो चार छोटे अधिकारियों या बिल्डिंग के चौकीदार/मैनेजर की सस्पेंशन और बलि…और इसके बाद शुरू होता है असली खेल….लीपा पोती !

एक ताकतवर देश वो होता है जो अपने एक नागरिक की मौत की कीमत जानता है । विकसित देश वो होता है जहां जान की कीमत होती है । अमेरिका में हजार कमियाँ हैं…पर वहां मौत एक सवाल है….! लेकिन भारत में मौत… सिर्फ एक आंकड़ा है ! वहां एक घटना “नंगी व्यवस्था” को आईना दिखा देती है..और यहाँ बड़े हादसे भी व्यवस्था के कूटरचित “इतिहास” के किसी “कुचक्र” में खो जाते हैं । न्यूयॉर्क में एक लड़के की मौत के बाद व्यवस्था बदलने की बात हो रही है…और हम मृतकों की संख्या तय करने में ही उलझे रह जाते हैं । न्यूयार्क का वो लड़का अब इस दुनिया में नहीं है । लेकिन उसकी मौत यदि डेढ़ सौ साल पुरानी व्यवस्था को बदल रही है…तो वह सिर्फ अपने माता पिता का बेटा नहीं रहेगा…बल्कि वह भारतीय व्यवस्था जैसी अनेकों व्यवस्था के लिए एक बड़ा सवाल बन जाएगा । ऐसा सवाल जो हर सरकार से पूछा जाना चाहिए । मुझे याद है कि अभी हाल ही में एक विदेशी महिला पत्रकार ने चुभता हुआ सवाल हमारी व्यवस्था से पूछ लिया था । परिणाम स्वरूप यहाँ पर आलोचकों ने उस महिला पत्रकार की स्विमिंग पूल में नहाते हुए अधनंगी वीडियो वायरल कर दी । मैं उस महिला पत्रकार की वो वीडियो यहाँ नहीं डाल सकता । यदि आप चाहें तो स्वमिंग पूल में तैरते हुए मेरी वीडियो देख सकते हैं ।

सोच कर कोफ्त होती है कि न्यूयॉर्क की व्यवस्था एक मौत के सवाल का जवाब तलाश रही है..और हम गिन रहे हैं…कि मरे कितने थे ? ताकि आंकड़ों की बाजीगरी दिखाकर अपने आपको व्यवस्था का सच्चा हितैषी साबित कर सकें । मैंने तो समझा था कि लखनऊ की आग ने सिर्फ 15 मानव देह को खाक किया है..लेकिन मुझे नहीं पता था कि इस आग ने व्यवस्था की संवेदनाओं को भी खाक कर दिया है । इस घटना को लेकर मैंने दैनिक जागरण की ख़बर देखी ! यह अखबार बहुत कम नहीं…बल्कि कभी कभार ही “सच” लिखता है ! लेकिन इस घटना के बारे में लिखता है कि सरकारी मशीनरी की ओर से घोर आपराधिक “कृत्य” हुआ है । दूसरी तरफ कुछ चाटुकार मीडिया अभी भी हद किये बैठे हैं । इन्हें देखकर तो अब यही लगता है…जैसे राजा हरिश्चन्द युग के शमशान रूपी मरघट के असली डोम यही हैं । ये डोम जब तक रानी तारामती के शरीर पर पड़े एकमात्र पल्लू से आधा टुकड़ा छीन नहीं लेंगे…तब तक उसके कलेजे के टुकड़े रोहताश्व को अग्नि भी नसीब नहीं होने देंगे । यहां लखनऊ में इतना भयावह अग्निकांड हुआ…15 बच्चे जलकर मरे…व्यवस्था की घोर लापरवाही और निकम्मापन प्रथम दृष्टया सामने आयी…एकल आवास के नक्शे पर चार मंजिला इमारत खड़ी पाई गई…और व्यवस्था के वाहक गले तक कटघरे में खड़े दिखाई दे रहे हैं ! अब ऐसी स्थिति में क्या इस व्यवस्था के कारनामों को…प्याज के छिलकों की तरह छीलकर अलग नहीं कर देना चाहिए…?

By systemkasach

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