व्यवस्था तब तक नहीं जागती…जब तक दर्द सत्ता के दरवाज़े तक न पहुँचे !

मेरे मन में आता कि किसी दिन किसी मंत्री की गाड़ी रास्ते में बैठे किसी आवारा पशु से टकरा जाए…और गाड़ी में मंत्री या उनके किसी रिश्तेदार को गंभीर चोट पहुँचे । मेरे मन में आ रहा है कि किसी बहुत बड़े अधिकारी, या मंत्री की गाड़ी रास्ते में यूं ही खड़े किसी ट्रक, कैंटर या टैंकर से टकरा जाए ! मेरी दिली तमन्ना है कि कोई भ्रष्ट पुलिस अधिकारी या जज किसी पेशेवर महिला के जरिये फर्जी बलात्कार के मुकदमों में फँसा दिया जाएं ! मेरी तीव्र इच्छा है कि किसी बे-जमीर रिश्वतखोर पुलिस वाले की “औलाद” का भविष्य किसी फर्जी मुकदमे के कारण तबाह और बर्बाद हो जाये !मेरी यह भी इच्छा है कि चंद रुपयों के लिए बिकने वाले पत्रकारों और पत्रकारिता की आड़ में वेश्याबाजी करने वाले पत्रकारिता के “बकचोंधड़ भांडों” को जब जरूरत पड़े…तो उनके सामने सारे दरवाजे बंद मिलें । ताकि उन्हें अहसास हो कि…सभी रास्ते बंद होने के बाद जब कोई पीड़ित उम्मीद से उनकी ओर देखता है…और उन्हें बिका हुआ पाकर “ना-उम्मीदी की” चादर ओढ़ लेता है…तो उम्मीदों पर क्या गुजरती है !

लेकिन मैं आपको स्पष्ट कर दूं कि यह मेरे “मन”के हालात हैं… लेकिन मैं ऐसा बिल्कुल भी नहीं चाहता कि किसी को चोट लगे…किसी का बुरा हो…लेकिन फिर भी ऐसा गंदा ख्याल मन में इसलिए आने लगा है…क्योंकि कुछ समय पहले यूपी के एक मंत्री के भतीजे की गर्दन राह चलते पतंग वाले चीनी मांझे में उलझी और गर्दन धड़ से अलग होते होते बची ! उस वक्त यूपी पुलिस ने देश में पहली बार उस चीनी मांझे के खिलाफ “हत्या” की कोशिश का मामला दर्ज किया…जबकि इसके पहले कई लोग “चीनी मांझे” की त्रासदी का शिकार हो चुके हैं ।

चीनी मांझे की खबर को पढ़ कर मुझे लगा कि जरूरी है कि किसी मंत्री की गाड़ी बीच सड़क पर बैठी गाय या “मदमस्त” घूमते सांड से टकरा जाए…और उसमें बैठे मंत्री या उनके घर वालों को गंभीर चोट लगे ताकि उन्हें इस तरह की गलतियों की पीड़ा का अहसास हो और “व्यवस्था” एक्शन में आए । कानपुर से लेकर लखनऊ दिल्ली और गोरखपुर में “पेशेवर” महिलाओं को और उनके दलालों को…”बलात्कार” के फर्जी मुकदमे को “हथियार” बनाकर खेलते हुए देखा ! देखकर मन में आया कि कोई भ्रष्ट “पुलिस अधिकारी” या “जज” किसी पेशेवर महिला के जरिये फर्जी बलात्कार के मुकदमे में फंसा दिया जाए…ताकि उन्हें महसूस हो कि ऐसे मामलों के लिए “व्यवस्था” में बदलाव कितना जरूरी हो गया है । और अगर किसी भ्रष्ट पुलिस वाले की “औलाद” किसी फर्जी मुकदमे का “दंश” भोगकर अपना भविष्य तबाह होता हुआ अपनी आँखों से देखे…तो वो भी अपने “वर्दीधारी बाप” से पूछे कि उसके साथ ऐसा क्यों हुआ…? पूछे, कि “कानून” तथा पुलिस उसके लिए क्यों कुछ कर नहीं पाई ? इन सवालों की “धार” से उसके बाप को यह अहसास हो कि “कानून” के दुरुपयोग के कारण फंसे हुए लोगों में भी “कमाई” का जरिया नहीं तलाशा जाता । यकीन मानिए कि…यदि ऐसा होने लगा तो सिपाही दरोगा और थानेदार स्तर की पुलिसिंग के अंदर “संवेदना” जाग जाएगी । अगर मंत्री की गाड़ी कहीं अंधेरे में बीच रोड पर खड़े किसी खराब ट्रक, टैंकर, कैंटर से टकरा जाए और किसी को गंभीर चोट लगे तो कानून एक्शन “मोड” में आ जाएगा…और खराब ट्रक या टैंकर के मालिक के खिलाफ “हत्या” का मामला दर्ज होगा ।

ऐसी तमाम घटनाएं रोज होती हैं…सड़कों पर आवारा गाय और सांड खड़े रहते हैं…रात के अंधेरे में कितनी मोटरसाइकिलें, गाड़ियां उनसे टकराती हैं…कितने परिवार फर्जी मुकदमों की भेंट चढ़ जाते हैं…क्योंकि हर कोई लड़ नहीं पाता ! कितने बच्चे “अनाथ” हो जाते हैं…लेकिन अगले दिन पत्रकारिता के “बकचोंधड़” भांडों के अखबार में बस छोटी सी औपचारिक “खबर” छपती है और जिंदगी आगे बढ़ जाती है । एक पुरानी “कहावत” याद आती है । “जाके पांव न फटे बिवाई, सो का जाने पीर पराई” !

हमने और आपने कितनी बार पढ़ा और सुना है कि चीनी मांझे से किसी युवक की गर्दन कट गई । किसी स्कूटर चालक की जान चली गई । कोई बच्चा गंभीर रूप से घायल हो गया । हर बार सरकार ने कहा कि प्रतिबंध लगेगा । हर बार अधिकारियों ने कहा कि कार्रवाई होगी । हर बार पुलिस ने कहा कि अभियान चलाया जाएगा । लेकिन चीनी मांझा बिकता रहा…लोग मरते रहे…लोग घायल होते रहे…फाइलें बढ़ती रहीं….बयान आते रहे…और जिंदगी चलती रही । मैंने जब चीनी मांझे की खबर पढ़ी तो सबसे पहले उस बच्चे के लिए दुख हुआ । किसी बच्चे के साथ ऐसा नहीं होना चाहिए । लेकिन तभी दूसरा विचार भी मन में आया… कि क्या आम आदमी का बेटा घायल होता तो भी यही धारा लगती ? क्या अब तक कभी लगी ? “करेला” हूँ इसलिए सवाल “कड़वा” है…लेकिन सवाल तो है ! सच यह है कि हमारे यहां दर्द की भी एक सामाजिक हैसियत है । गरीब का दर्द “आंकड़ा” बन जाता है…मध्यम वर्ग का दर्द “खबर” बन जाता है…लेकिन “वीआईपी” का दर्द व्यवस्था की “प्राथमिकता” बन जाता है । शायद इसलिए कि दर्द जब तक सही “दरवाजे” तक नहीं पहुँचता…तब तक दर्द का अहसास इस “व्यवस्था” को नहीं होता ! एक सभ्य समाज की पहचान यह नहीं होती कि वह किसी मंत्री अधिकारी की “औलाद” और भतीजे के घायल होने पर कितना सक्रिय हुआ । एक सभ्य समाज की पहचान यह होती है कि वह उस अनजान बच्चे के लिए भी उतना ही “सक्रिय” हो…जिसका नाम किसी मंत्री और अधिकारी की “वंशावली” में नहीं लिखा है । दुखद है कि वो हमारा और आपका “दर्द” तब तक नहीं समझते जब तक उन पर नहीं बीतती ! इसलिए ऐसा ही मन में आता है कि…भगवान कुछ ऐसा करे कि…उनके साथ भी ये सब हो जाए !

जब पुलिस किसी निहत्थे को गोली मारती है तब सिर्फ एक आदमी नहीं मरता…सबसे पहले कानून मरता है…फिर संविधान मरता है.. और सबसे आखिर में एक आम नागरिक का भरोसा मर जाता है ।तारीख 31 मार्च 1997 ! दोपहर के करीब ढाई बजे खबर आई कि देश की राजधानी पुलिस ने “कनॉट प्लेस” में दो दुर्दांत अपराधियों को मार गिराया है । वही पुरानी स्क्रिप्ट जिसमे कहा गया कि उन्होंने पुलिस पर गोलियां चलाई थीं…और पुलिस ने आत्मरक्षा में जब जवाबी फायरिंग की…तो दोनों मारे गए ।

व्यवस्था के “बकचोंधड़” अखबारों ने बहादुरी की गाथाएं लिखी । लोगों ने कहा… शाबाश राजधानी पुलिस ! पुलिस ने जिसे मार दिया था वो शख्स इंजीनियर एस्टेट वाले प्रदीप गोयल थे । कुछ लोगों को यह बात “हजम” नहीं हुई कि जिसके चेहरे पर कभी अपराध नहीं देखा…वह अचानक देश का सबसे बड़ा “बदमाश” कैसे बन गया था ? अगली सुबह व्यवस्था के “बकचोंधड़” अखबार पुलिस की “वीरता” से भरे पड़े थे । लेकिन एक आदमी ऐसा भी था जिसने अखबारों की बात मानने से इनकार कर दिया था…और वह था प्रदीप गोयल का बूढ़ा पिता ! उसने बेटे की “लाश” देखी और कहा… कि मेरा बेटा “अपराधी” नहीं था !” बस…यहीं से लड़ाई शुरू हुई । एक बूढ़े बाप ने पूरी पुलिस “व्यवस्था” को चुनौती दे दी । लोग सामने आने लगे…सवाल उठने लगे…कुछ दबे कागजात, जाँच और प्रार्थनापत्र बाहर निकले…और फिर वही हुआ…जिससे हर “झूठ” डरता है !

“सच” बाहर आ गया…जिसे एनकाउंटर कहा गया था…वह सवालों के घेरे में आ गया ! जिसे बहादुरी कहा गया था…वह “अदालत” की कसौटी पर टिक नहीं सका ! जिस पुलिस अधिकारी की पीठ थपथपाई जा रही थी…वही अब “अदालत” में कटघरे में खड़ा था ! वो इसलिए…क्योंकि “लोकतंत्र” में वर्दी “कानून” से बड़ी नहीं होती । उस मामले में एसीपी राठी और उनकी टीम को सजा मिली… आजीवन “कारावास” की सजा ! लेकिन एक बात आज तक “ज़हन” में गूंजती है…कि अगर वह “बूढ़ा” बाप चुप बैठ जाता…और अगर यह “ढकोसलेबाज” समाज कह देता कि…पुलिस ने मारा है…तो कुछ सोचकर ही मारा होगा ! अगर सवाल नहीं उठते…अगर हार मान ली जाती…अगर चुप रह जाते…तो आज इतिहास की किताबों में प्रदीप गोयल एक “दुर्दांत अपराधी” लिखे जाते !

सिस्टम कभी इंसाफ नहीं करता… लेकिन समय अपना हिसाब ज़रूर लिखता है । सरकारी नौकरी मिलना आसान नहीं होता । ठीक ऐसा ही हुआ…जब वर्षों की मेहनत के बाद एक नौजवान का चयन “ए” क्लास अधिकारी के पद पर होता है । तभी एक प्रेम प्रसंग को आधार बनाकर उसके विरुद्ध एक ऐसा मुकदमा दर्ज होता है…जो शुरू से ही झूठा था । सच्चाई पुलिस भी जानती थी…लेकिन जब पता चला कि यह युवक कुछ ही दिनों में बड़ा सरकारी अधिकारी बनने वाला है… तो उसे छोड़ने की कीमत तय होने लगी । उस नौजवान के पिता “सेना” में थे ! उन्होंने साफ़ शब्दों में “रिश्वत” देने से इनकार कर दिया ! नतीजा…बेटा “जेल” भेज दिया गया ! समय बीतता गया…और वर्ष 2019 में उसी मुकदमे की सुनवाई के दौरान विवेचक रहे दरोगा को “अदालत” में गवाही के लिए बुलाया गया । अब न वर्दी थी…न पद की ताकत ! सेवानिवृत्त हो चुके थे…दिल के मरीज थे… पत्नी के सहारे काँपते कदमों से “अदालत” पहुँचते थे । बिना सहारे के चल नहीं पाते थे इसलिए हर बार “अदालत” से गुहार लगाते थे कि अगली बार फिर न बुलाया जाए । जिरह शुरू हुई…एक बार नहीं…कई बार अदालत में आना पड़ा ! हर पेशी के साथ ऐसे सवाल उठे जिनसे “विवेचना” और पूरी प्रक्रिया कठघरे में खड़ी होती चली गई ।

फिर एक दिन अदालत परिसर में ही “दिल” का दौरा पड़ा…और दरोगा जी अपने “पाप” और “साजिशों” की “गठरी” समेत “गोलोकवासी” हो गए । दरोगा जी की मौत के कुछ ही महीनों बाद एक और घटना हुई । उनका इकलौता बेटा…जो चार दिन बाद “दरोगा” की ट्रेनिंग जॉइन करने वाला था…वो एक “बलात्कार” के मुकदमे में जेल चला गया । बताया गया कि वह मामला भी एक असफल “प्रेम संबंध” से जुड़ा था । यह “सदमा” माँ सहन नहीं कर सकीं…और कुछ समय बाद उन्होंने भी “दुनिया” छोड़ दी । आज…दरोगा बनने का सपना देखने वाला वही बेटा जिले का टॉप चेन “स्नैचर” कहलाता है । यह किसी “उपन्यास” की कहानी नहीं है…बल्कि यह “गोरखपुर” के थाना “गोरखनाथ” से जुड़ी एक वास्तविक घटना है । आजकल वो “नौजवान” कहाँ है जिसके साथ यह घटना घटी थी ? फिलहाल उस कहानी का “नौजवान”…आज 17 साल बाद…यह “पोस्ट” लिख रहा है…जिसे आप इस वक्त पढ़ रहे हैं ।

मैं सिर्फ इतना ही कहता हूँ कि अन्याय, अहंकार, भ्रष्टाचार और षड्यंत्रों के विरुद्ध हर लड़ाई मैंने अपने “दम” पर लड़ी है । कभी किसी व्यक्ति, संगठन या सत्ता के कंधे का सहारा नहीं लिया… फिर भी आज तक सीना तानकर खड़ा हूँ । मैं उन लोगों में से नहीं रहा…जिन्होंने पैर से रुपये का “स्पर्श” हो जाने पर उसे “माथे” से लगाया हो..क्योंकि मेरे लिए “धन” कभी पूजनीय नहीं रहा ! मैंने कभी “विद्या कसम” खाने जैसी “रूढ़ियों” पर बचपन से ही विश्वास नहीं किया…कभी भूल से किसी “पुस्तक” पर पैर लग भी गया…तो उसे माथे से लगाकर मैंने अफसोस जाहिर नहीं किया…फिर भी “वेश्याबाज” पत्रकारों की तुलना में “सरस्वती” माता मुझ पर ज्यादा मेहरबान रहीं ! ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने के बावजूद मैंने कभी “बजरंग बाण” और “हनुमान चालीसा” का पाठ कभी नहीं किया… फिर भी तीन तीन “जानलेवा” हमलों के बाद भी आज तक जीवित हूँ । मैंने “अन्याय” के सामने सिर झुकाना नहीं सीखा… इसलिए जिस “अदालत” में मेरे विरुद्ध मुकदमा चल रहा है…उसी अदालत के “न्यायाधीश” के विरुद्ध मैंने जाँच बैठवा दी…क्योंकि मेरे लिए न्याय किसी व्यक्ति से कहीं अधिक बड़ा है । मेरे लिए “पेट” कभी सिद्धांतों से बड़ा नहीं रहा…इसलिए जेल में भी 9 दिनों तक “अनशन” पर अड़ा रहा ! मेरे लिए परिवार भी “कर्तव्य” से ऊपर कभी नहीं रहा…इसलिए घर की बिजली तीन महीने तक कटी रही…लेकिन अंधेरे से लड़ता हुआ “अदालत” तक पहुँचा…और अंततः यूपी बिजली विभाग के “एम.डी.” तक को कानून के “कटघरे” में खड़ा करके अपना अधिकार छीन लिया ! मेरी पूरी यात्रा का संदेश सिर्फ एक ही रहा है कि मुझे डराकर या मारकर जीता नहीं जा सकता । मैं “शहादत” का शौकीन नहीं हूँ… लेकिन जिऊंगा तो अपनी “शर्तों” पर ! इसलिए मुझे “मरने” की नहीं…सिर्फ गलत के सामने “झुकने” की चिंता होती है ।

देश में ऐसी न जाने कितनी कहानियाँ हैं…जहाँ सच वर्षों तक फाइलों, वर्दियों और अदालतों के बीच दबी रहती हैं । आज 17 साल बाद…वही बेचैनी फिर लौट आई है । अब देख लीजिए कि यूपी के जिला चंदौली में एक पत्रकार साहब को SDM साहब की मौजूदगी में महिला सप्लाई इंस्पेक्टर ने कई बार कहा कि…तुम दलाल हो ! तुम दलाल हो ! और SDM साहब यह सब सुनते हुए कुर्सी पर बैठकर मंद मंद मुस्कुरा रहे थे । देखिए वीडियो !

वीडियो देखकर चौकिये मत…क्योंकि यही वो “सच” है जो आपने अर्जित किया है ! सबसे बड़ा “दुर्भाग्य” तो यह है कि…गोरखपुर के पत्रकारिता जगत का सामना इससे भी कहीं ज्यादा “विद्रूप” और भयानक “सत्य” से होने वाला है । एक बार “द्रौपदी” ने हंसकर कहा था कि “अंधे” का बेटा “अंधा” ही होता है । सिर्फ एक वाक्य था…सिर्फ एक “हंसी” थी…लेकिन यह “हंसी” अनेकों “करुण क्रंदन” और “विलाप” का कारण बना । गोरखपुर के कुछ कथित पत्रकारों को भी यह ध्यान रखना चाहिए…पत्रकार चाहे किसी अखबार का हो या फिर किसी सोशल मीडिया का ! वेश्याबाजी की कीमत और “वेश्याबाजों” का साथ देने की कीमत तो चुकानी ही होगी ! दिमाग पर थोड़ा जोर डालिये…तो जरूर याद आएगा कि “मसला” क्या था ? जब आपने यह किया था…तब उसी दिन आपके “कर्मदंड” में यह स्वतः लिख गया था कि…आपकी “हंसी” बहुत दूर तलक नहीं जाएगी । क्योंकि इस सिस्टम की “व्यवस्था” में हर “मुस्कान” दर्ज होती है…और हर “ठहाका” नोट होता है । तबीयत तो ठीक है न “खबीस पांडेय” जी ! अपना “रक्तचाप” और “चीनी” वगैरह मापते रहिएगा…बड़ी “धोखेबाज” चीज होती है…अक्सर अपनी “सीमाओं” को चुपचाप “लांघ” जाती है !

कुछ लोग अक्सर अपनी “मक्कारियों” की कामयाबी पर बड़ा खुश होते दिखाई पड़ते हैं । अपनी “मक्कारियों” की कामयाबी पर मत हंसिए… क्योंकि समय का “पहिया” अनवरत घूमता है । फिर पहिया घूमेगा…और आज जो “दृश्य” आपको “मनोरंजक” लग रहा है…कल वही “दृश्य” आपके “दरवाजे” पर खड़ा मिलेगा…! इस बात का यकीन कीजिये कि “इतिहास” बदलता रहता है…”पात्र” भी बदलते रहते हैं…”नाम” भी बदलते रहते हैं…लेकिन “कर्मदण्ड” नहीं !

By systemkasach

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