गोरखपुर : लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति केवल संविधान नहीं, बल्कि उस संविधान पर जनता का विश्वास है । और उस विश्वास की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है निष्पक्ष पुलिस ! यदि पुलिस निष्पक्ष है तो निर्दोष सुरक्षित रहता है और अपराधी दंडित होता है…किंतु यदि पुलिस ही संदेह के घेरे में आ जाए, तो न्याय व्यवस्था की पूरी इमारत हिलने लगती है । फर्जी FIR दर्ज होने के मामले तो अक्सर सुने जाते हैं… लेकिन फर्जी FIR पर भी चार्जशीट ही लगानी हो…तो गोरखपुर पुलिस के एक विवेचक और सीओ क्या कुछ करते है…ये आपको देखना चाहिए ! होता ये है कि…2024 में जिला अस्पताल में व्याप्त भ्रष्टाचार पर साक्ष्य आधारित खबर प्रसारित होती है । खबर के प्रसारण के बाद आरोपियों के खिलाफ शासन से जाँच बैठा दी जाती है । खबर और खबर नके परिणाम से बौखलाए आरोपी पहले एसएसपी गोरखपुर के पास FIR दर्ज कराने पहुँचते है । एसएसपी पहले जाँच की बात कहते हैं…लेकिन थोड़े दिन बाद ही कोतवाली पुलिस बगैर जाँच किये इस मामले में गुपचुप तरीके से ख़बर प्रसारित करने वाले विरुद्ध एक फर्जी मुकदमा दर्ज कर लेती है । मुकदमा दर्ज होने के बाद शासन ने अपनी जांच में जिला अस्पताल के आरोपियों को दोषी ठहराते हुए उनके खिलाफ कार्यवाही की संस्तुति कर दी । लेकिन दूसरी तरफ जब खबर प्रसारित करने वाले के खिलाफ कोई भी साक्ष्य पुलिस को नही मिलता… तो कोतवाली पुलिस फर्जी सबूत गढ़ते हुए बतौर गवाह एक सरकारी कर्मचारी के जाली हस्ताक्षर बनाती है और आरोप पत्र न्यायालय भेज देती है । बाद में पता यह चलता है कि इस फर्जी मुकदमे पर किसी भी तरह से आरोप पत्र भेजने का भारी दबाव कहीं और से नहीं बल्कि खुद सीओ कोतवाली…की ओर से बनाया जा रहा था । लिहाजा मुक़दमे के विवेचक दीप मंजरी पांडेय ने यह कारनामा कर दिखाया । और सी ओ साहब द्वारा भी इस आरोप पत्र पर हस्ताक्षर बनाकर इसे न्यायालय में भेज दिया गया । इस मामले में पुलिस नोटिस पर पुलिस द्वारा एक सरकारी कर्मचारी के बनाये गए जाली हस्ताक्षर को पहले देखिए ।

क्या कहता है कानून….?
प्राप्त जानकारी के अनुसार अब यह मामला “न्यायालय” के साथ ही “हाइकोर्ट” के “संज्ञान” में भी आ चुका है…और इस मामले के गंभीर परिणाम हो सकते हैं । जाली हस्ताक्षर के इस प्रकरण में जिम्मेदारों में खिलाफ BNS 2023 के अंतर्गत जालसाजी, जाली दस्तावेज़ का उपयोग, साक्ष्य गढ़ना, धोखाधड़ी तथा आपराधिक षड्यंत्र जैसी धाराओं में तहत मुकदमा दर्ज किया जा सकता है । यहां पर “लोकसेवक” होने के नाते किसी भी पुलिसकर्मी को किसी भी कीमत पर BNSS की धारा 218 का लाभ इसलिए नहीं मिलेगा… क्योंकि “सुप्रीम कोर्ट” का हालिया निर्देश इस तरह के कृत्यों में BNSS की धारा 218 के प्रावधानों को बाधित करता है । सीओ साहब फ़िलहाल यह कह कर बचने का प्रयास कर सकते हैं कि…उन्हें इस बात की जानकारी ही नहीं थी । लेकिन इस मामले में ऐसा इसलिये संभव नहीं हो सकेगा…क्योंकि “सीओ” साहब का सम्बंध सिर्फ इस घटना से न होकर तामाम उन घटनाओं से भी जुड़ा हुआ है…जहाँ एक “अपराधी” को बचाने के लिए…सीओ साहब द्वारा “अपराधी” के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करवाने वालों को ही कई बार “प्रत्यक्ष” और “अप्रत्यक्ष” तौर पर निशाना बना चुके हैं ।
लगातार नए तथ्य आ रहे सामने…
डीएसपी “कल्पना वर्मा” और डीएसपी “ऋषिकांत शुक्ला” द्वारा भ्रष्टाचार से कमाई गयी अकूत संपत्ति और हाल ही में हुई उनकी गिरफ्तारी की घटना अभी पुरानी नही हुई है । गोरखपुर में करोड़ों के “वक्फ” जमीनों की खरीद फरोख्त…तथा इससे जुड़े पेशेवर बदमाश इक़रार अहमद की खबर के प्रकाशन और प्रसारण के बाद उपजे “साजिश” के तार भी अब सीधे सीधे सीओ साहब से जुड़ने के प्रमाण सामने आ रहे हैं । आरोप यही है कि उक्त मामले में “शिकायतकर्ताओं” और “वादकारियों” को फंसाने के लिए तथा “इकरार अहमद” को बचाने के लिए “सीओ” साहब ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए तमाम “गैरकानूनी हथकंडे” अपनाए । नतीजतन 2024 से लेकर अब तक “शिकायतकर्ताओं” तथा खबर का प्रकाशन व प्रसारण करने वालों के खिलाफ फर्जी घटनाओं को “फ्रेम” कर थाना तिवारीपुर,कोतवाली,शाहपुर और कैंट में अलग अलग एक एक कर पाँच फर्जी मुकदमे लिखे गए । हालांकि इनमे से तमाम फर्जी मुकदमों का “पर्दाफाश” तभी हो गया…जब इन्हें अधिकारियों के “संज्ञान” में लाया गया । पर सवाल यह है कि एक मामूली से प्रार्थना पत्र पर भी जाँच जाँच खेलने वाले “थानेदारों” ने इन मामलों में बगैर अधिकारियों के आदेश के मुकदमा झट से किसके दबाव और “पैरवी” में दर्ज कर लिया । शाहपुर थाने में 2025 में दर्ज मुकदमे में भी जब “प्रेस कॉउन्सिल ऑफ इंडिया” द्वारा संज्ञान लिया गया…तब जाकर “वादी” मुकदमा ने अपने बयान में कुछ पत्रकारों और पुलिस वालों को इसका जिम्मेदार ठहराया । इस मामले में वादी मुकदमा महिला “अंगूठाछाप” थी लेकिन पुलिस ने उस “अंगूठा छाप” से भी दो पन्नो की करामाती “तहरीर” लिखवा डाली । तहरीर में उसका नाम भी डाल दिया गया जो वादी मुकदमा का “पड़ोसी” था । सूत्र इस मामले में भी “सीओ” साहब का ही नाम सामने आने का दावा कर रहे हैं ।
वादी मुकदमा,गवाहों,और कोर्ट में खड़े वादकारी पर दबाव की नीयत से दर्ज की गई फर्जी FIR…!
इस मामले के अब जाकर “तूल” पकड़ने का कारण यह है कि दिल्ली राज्य में “पेशेवर औरतों” को सन 2025 में सुपारी देकर शिकायतकर्ताओं को “फर्जी गैंगरेप” में फंसाने के मामले का “पर्दाफाश” हो गया । “पर्दाफाश” होते ही यह सनसनीखेज मामला “न्यायालय” के सामने भी जा पहुँचा । न्यायालय के आदेश के बाद जब इस मामले में प्रमुख तौर पर “दरगाही” बदमाश “इक़रार अहमद” का नाम सामने आने लगा…और जब “कानून” का “शिकंजा” इस मामले में “इक़रार अहमद” और उसके “गुर्गों” पर कसने लगा…तब इन पेशेवर “बदमाशों” को बचाने के लिए शिकायतकर्ताओं पर 9 माह पुरानी फर्जी घटना दिखाते हुए थाना कैंट में महज 17 दिन पहले डकैती,अपहरण और अटेम्प्ट टू मर्डर जैसी गंभीर धाराओं में “केस” बगैर किसी जाँच के दर्ज करा दिया गया । मतलब “इक़रार अहमद” और उसके “गुर्गों” के खिलाफ “वादी मुकदमा” और “मुकदमे के गवाह” समेत “न्यायालय” में खड़े “वादी” सब पर एक साथ ही बगैर किसी “जाँच” और “जहमत” के “मुकदमा” लिख दिया गया । इस फर्जी मुकदमे को लिखाने के लिए भी उसी “अंगूठा छाप” महिला का इस्तेमाल “इक़रार अहमद” द्वारा किया गया…जिसका इस्तेमाल “इक़रार अहमद” द्वारा अब तक विभिन्न लोगों के खिलाफ चार से पाँच “मुकदमे” लिखवाने के लिए पहले भी किया जा चुका है । मुकदमा लिखाने वाली “महिला” का “इक़रार अहमद” और उसके परिवार से पुराना सम्बन्ध बताया जा रहा है । बेहद विश्वस्त और अंदरूनी सूत्रों का दावा है कि थाना कैंट में लिखे गए इस फर्जी मुकदमे के पीछे भी “सीओ” साहब का ही हाथ है । “इक़रार अहमद” के खिलाफ “हनीट्रैप गैंग” मामले में वादी मुकदमा “शाहिद खान” का यह आरोप है…कि “सीओ” साहब हर जगह “इक़रार अहमद” जैसे पेशेवर अपराधी को “सीएम योगी” का करीबी बताकर अधिकारियों को “गुमराह” करते हैं…और जब इसकी “शिकायत” लेकर वह “सीएम योगी” से मिलने “जनता दरबार” पहुँचा था…तब “सीओ साहब” ने उसकी “दरखास्त” देखकर उसे अंदर जाने से रोकते हुए स्वयं “कार्यवाही” करने का “आश्वासन” देकर लौटा दिया था । फर्जी FIR करने से क्या होगा “सीओ” साहब ? आदि “शंकराचार्य” आठवीं और नौवीं “शताब्दी” के बीच ही अपने “अद्वैत सिद्धांत” के तहत समझा गए हैं… कि जो है ही नहीं..उसे कहाँ से “ढूँढोगे” ? और जो हर तरफ दिख रहा है उसे कहाँ तक “छिपाओगे” ? इसलिए इन फर्जी “मुकदमों” में “इक़रार” के खिलाफ खड़े “शिकायतकर्ताओं” और “गवाहों” के किरदार को जबरन “गढ़ने” के “भगीरथ” प्रयास का कोई फायदा नहीं है…और न ही हर तरफ दिखाई दे रही “मक्कारी” को छिपाने का कोई “लाभ” है !
दरगाह पर एक और नया कारनामा…!
गोरखपुर स्थित “दरगाह मुबारक खाँ” पर संचालित सशंकित गतिविधियां और वहां पर रोजाना हो रहे “गुंडों” के जमावड़े का एक ताजा मामला भी अभी अभी सामने आया है । एक महिला द्वारा “इक़रार अहमद” और उसके गुर्गों “जफर खान” समेत अन्य गुंडों के खिलाफ थाना “राजघाट” में एक “मुकदमा” पंजीकृत कराया गया है । आप हैरान होंगे कि सीओ कोतवाली साहब के रहते “इक़रार” और उसके “गुर्गों” के खिलाफ थाना “राजघाट” में मुकदमा कैसे लिखा जा सकता है ? इसलिए हैरान होने की जरूरत नहीं है…क्योंकि यह “मुकदमा” एसएसपी गोरखपुर के निर्देश के बाद “पंजीकृत” हुआ । एक बार दर्ज मुकदमे की “तहरीर” को पढ़िए…तो अहसास होगा कि कभी “रूह” को सुकून देने वाली “मुबारक खां दरगाह” की पाक “सरजमीं” अब असामाजिक तत्वों और “गुण्डों” का “अखाड़ा” बन चुकी है । देखें मुकदमा…!
“इक़रार अहमद” और उसके “गुर्गों” के खिलाफ दर्ज इस मुकदमे में “राजघाट” पुलिस ने कार्यवाही करने की बजाय…पीड़ित महिला और उसके सहयोगियों पर थाना “राजघाट” में ही 15 दिन बाद 18 जून 2026 को गुर्गे आरोपी “जफर खान” की तहरीर पर उल्टा “मुकदमा” लिख दिया । इस “करिश्मेबाजी” के लिए हम “थानेदार” साहब को बिल्कुल भी जिम्मेदार नहीं ठहराएंगे…क्योंकि इस “करामात” में भी “सीओ” साहब का ही हाथ बताया जा रहा है । अब जाँच करनी ही है तो इस महिला के मुकदमे की जाँच कीजिये “सीओ” साहब ! इसने दरगाह, इक़रार जफर तथा गुर्गों के बारे में बहुत कुछ तो अपनी “तहरीर” में ही लिख दिया है ! जाँच करनी ही है…तो अपने उस “अगाध प्रेम” और “पक्षपात” की किजिए…जो “पुलिस प्रपत्रों” में दर्ज एक “पेशेवर बदमाश” की “मोहब्बत” में “माउंट एवरेस्ट” की “ऊंचाईयो” को भी “मात” दे रही हैं ! जाँच करनी ही है तो “मक्कारियत” के आगे अपनी “रीढ़” टेढ़ी कर लेटे हुए उन “चाटुकारों” की कीजिये…जिन्होंने एक बेहद ही पतित “अपराधी” को “ईश्वरीय दर्जा” दे रखा है । देखें जफर द्वारा दर्ज कराई गई FIR
सीओ साहब से क्यों जुड़ रहे हैं घटना में तार…?
इस प्रकरण से जुड़े ऐसे ही तमाम घटनाक्रमों को सिलसिलेवार तरीके से रखते हुए…तथा उनके साथ जुड़े “सबूतों” और “प्रमाणों” को “कनेक्ट” करते हुए “बारह पन्ने” का एक “डोजियर” सीओ कोतवाली के खिलाफ “केंद्रीय गृह सचिव” को भेजा गया है । इस “डोजियर” में 2024 से घटित घटनाक्रम का सिर्फ विवरण ही नहीं दिया गया है…बल्कि सभी “तथ्यों” से जुड़े “सबूत” प्रस्तुत करने का दावा किया गया है । “डोजियर” का अध्ययन करने के बाद इस प्रश्न का “जवाब” स्वतः मिल जाता है कि…आखिर घटना के “तार” सीओ साहब से क्यों जुड़ रहे हैं ? नीचे PDF पर क्लिक करें !
2024 से लेकर अब तक घटे “साजिशपूर्ण” घटनाक्रम तथा प्रचलित “आपराधिक साज़िशों” की जानकारी तथा सम्बंधित “इनपुट्स” दो माह पहले ही “इलाहाबाद हाइकोर्ट” को भेजी जा चुकी थी । इसके बाद इन “साजिशों” फर्जी “मुकदमों” और इनसे जुड़े “किरदारों” के विवरण तथा “साक्ष्य” “अटैच” करते हुए महीने भर पहले ही इसे “इलाहाबाद हाइकोर्ट” के समक्ष “सूचीबद्ध” कराया जा चुका है…तथा इस सुनवाई में थाना “कोतवाली” को प्रमुख तौर पर “पक्षकार” बनाया गया है ।
तीसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट द्वारा भी सन 2025 में भी फर्जी मुकदमों को लेकर “हस्तक्षेप” किया जा चुका है । इस “हस्तक्षेप” के बाद पुनः एक बार फिर से 2026 में 9 माह पुरानी घटना को लेकर एक नए फर्जी FIR के “अवतरण” को गंभीरता से लिया गया है । 2025 में “सुप्रीम कोर्ट” द्वारा किये गए “हस्तक्षेप” और 2026 में पुनः इस प्रकरण का स्टेटस देखने के लिए नीचे दिए गए पीडीएफ पर क्लिक करें ।
मौजूद सबूतों की रोशनी में मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है सीओ साहब…कि एक “पेशेवर अपराधी” के लिए आपने “श्रवण कुमार” जैसी “परंपरा” का पालन करते हुए अपने “कंधों” पर “अनैतिकता” का भारी बोझ उठा लिया है । मुझे तो अब जाकर पता चला है…कि ये मुकदमे आपकी “कृपा पात्रता” के कारण मुझे “नाहक” ही नहीं मिले हैं…बल्कि यह तो आपके “ईश्वरीय” दूत “इक़रार अहमद” को नाहक “कष्ट” पहुँचाने और उन्हें “बदनाम” करने का “दैवीय” और “अंतरराष्ट्रीय” इनाम है । आपने पिछले दो ढाई सालों में सब कुछ कर लिया…और अब यह भी करके देख लीजिए ! अपने “पद” और “मद” में निहित “शक्तियों” के दुरुपयोग के समस्त “सप्तसिंधु” को पार करके देख लीजिए…लेकिन यकीन मानिए कि…मैं आपके “ईश्वरीय” दूत “इक़रार अहमद” समेत सारे “खल” चरित्रों को “कानून” और “संविधान” के आगे “घुटने” टेक कर बैठने पर “विवश” कर दूँगा ! इसका भी यकीन मानिए कि…पेशेवर औरतों के “बाजार” में मैं भी घूम सकता हूँ…चंद रुपये फेंक कर किसी पर भी “फर्जी” मुकदमे बड़े आराम से “लिखवा” सकता हूँ…बस खुद के “किरदार” में थोड़ी सी “नीचता” लाने की जरूरत है…जिसकी “इजाजत” मेरी “परवरिश” नहीं दे रही !
विभागीय बनाम व्यक्तिगत…!
यूपी पुलिस का सारा काम “विभागीय” होता है जो सीधे सीधे “कानून व्यवस्था” से जुड़ा होता है…लेकिन हैरत यह है कि…”सीओ” साहब ने इसे “व्यक्तिगत” लड़ाई बना दिया है ! क्या यूपी पुलिस की किसी से कोई “दुश्मनी” होती है ?…बिल्कुल नहीं होती…बस, सिर्फ “लॉ एंड आर्डर” मेंटेन करना होता है । लेकिन जब कोई पुलिस कर्मी “लीक” से हटकर किसी “मसले” को “व्यक्तिगत” बना लेता है…तो उसे उसका “खामियाजा” व्यक्तिगत तौर पर ही “भुगतना” होता है । इस मामले में भी किये गए “अनैतिक” कार्यों को “विभागीय” नहीं कहा जा सकता…और न ही इसका कोई “कनेक्शन” पुलिस विभाग से है । यह प्रकरण सीधे सीधे “सीओ कोतवाली” के “व्यक्तिगत” हित से जुड़ा हुआ है…जिसके लिए उन्हें “व्यक्तिगत” तौर पर ही “जिम्मेदार” ठहराया जाना चाहिए । मैं जानता हूँ कि अब इस कथानक से जुड़े अंगले “चरण” में अपने आप को बचाने के लिए…आप द्वारा “एफिल टावर” से भी ऊँचा “हाई मॉरल ग्राउंड” लिया जाएगा…”अंधे” कानून की “आंखों” पर एक और “पट्टी” बांधने का असफल प्रयास किया जाएगा…लेकिन अफसोस कि अब नए कानून में “न्याय के देवी” की “आंखों” पर “पट्टी” नहीं है । इस घटना ने यह खूब समझाया है कि थानों पर बैठे कुछ लोग “मुकदमा” लिखवाने…और लिखे गये “मुकदमों” के बदले एक और “मुकदमा” लिखवाने के नाम पर ही “लाखों” बटोर ले रहे हैं । ये चंद पुलिस कर्मी इतने “विशाल” हो चुके हैं…कि उनके आगे “घृतराष्ट्र काल” के “संजय” के आंखों की रोशनी भी “चुंधियाँ” कर “चोक” हो गयी है । कहा जाता है कि ये “धरती” चल ही इसलिए रही है…क्योंकि यहाँ “मक्कारी” और “फरेब” की “राजसत्ता” पूरे सौ प्रतिशत पर कभी जा ही नहीं सकती…जब तक “मक्कारी” व्यवस्था में हैं…तब तक एक दो प्रतिशत जैसी “जड़ें” हिलाने वाली “आंधियां” तो हमेशा रही हैं और हमेशा रहेंगी भी ! एक “पत्रकार” जो आपके “सड़” चुके और “बॉस” मारते “कोतवाली सिस्टम” के मामले में लगातार सबूतों के साथ तथ्यात्मक ख़बरें रिपोर्ट कर रहा है…एक “पेशेवर अपराधी” के गंभीर “अपराधों” की ओर आपका ध्यान “आकृष्ट” करा रहा है…जो जैसा है उसे ज्यों का त्यों छाप दे रहा है ! तो फिर “फर्जी मुकदमों” के जरिये उसके बारे में आप जैसों को “छानबीन” कराने की आखिर ज़रूरत क्यों पड़ रही है ? अरे “छानबीन” ही करनी है तो “पेशेवर” औरतों की पनाहों में घिरे उस पेशेवर बदमाश “इक़रार अहमद” और उसके गुर्गों की कीजिये…जिसके वास्ते “कर्म” की नैतिकता और “पद” की महत्ता ने आपको ये “वर्दी” सौंपी है ! छानबीन ही करनी है तो उस “बदमाश” की किजिए…जो कई परिवारों के “भविष्य” और “आत्मा” को “वेश्यायों” के जरिये कुचलवा कर “दरगाह” की आड़ में “देशविरोधी” गतिविधियों का “बाजार” सजाए बैठा है । यकीन मानिए कि मैंने एक से बढ़कर एक “जजों” और “पुलिस” अधिकारियों को “रिटायर” होने के बाद टूटकर बिखरते देखा है । कभी जिनकी एक “छींक” पर पूरा “तंत्र” हिल जाया करते थे…आज वही “बुढ़ापे” में अपनी “दुर्गति” को अंजाम तक पहुँचाने के लिए “आत्महत्या” का सहारा ले रहे हैं । बस देखते जाईये कि…इस मामले की सारी “मक्कारियों” की “पटकथा” की पूरी “जमीन” को…”सत्यमेव जयते” अपने “विशाल वट” की शाखाओं से कैसे “ढक” लेता है ।

