जिला अस्पताल में “मरीज माफिया” या दैनिक जागरण का “सच” छिपाने का मीडिया मैनेजमेंट ?

गोरखपुर : जिला अस्पताल गोरखपुर में मरीजों की दलाली को लेकर “दैनिक जागरण” में प्रकाशित आज की खबर को देखिए । खबर में दावा किया गया कि “सीसीटीवी” कैमरों का रुख दीवारों की ओर कर दिया गया ताकि मरीजों की दलाली करने वाले “मरीज माफिया” बेखौफ अपना कारोबार चला सकें । इतना ही नहीं, यह भी बताया गया कि “प्रमुख अधीक्षक” ने पूरे मामले में पुलिस को पत्र लिखा है । पहली नजर में यह “ख़बर” आपको सच लगेगी…लेकिन आपको बता दें कि यह “सच” नहीं है…बल्कि “मदारी” के इशारों पर नाचने वाले “दैनिक जागरण” के “पत्रकार” महोदय की “मक्कारी” का एक बेहद छोटा सा “नमूना” है ।

सुनने पढ़ने में यह खबर बड़ी “दमदार” लगती है । लेकिन सवाल यह है कि क्या पूरी कहानी भी उतनी ही “दमदार” है ? या फिर हमेशा की तरह कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा “गायब” कर उसका “रूख” किसी और को “निशाना” बनाने के लिए मोड़ दिया गया है ? “सिस्टम वेबसाइट मीडिया” के पास उपलब्ध सबूतों के अनुसार सत्यता यह है कि…इस “खबर” में जिस मूल घटना से पूरा “विवाद” शुरू हुआ…उसे ही बड़े ही सुविधाजनक ढंग से “पर्दे” के पीछे धकेल दिया गया है । आखिर क्यों ?

आखिर किसका गणित बिगड़ रहा है ?

जिला अस्पताल में पिछले लगभग 25 वर्षों से जमे एक “शातिर” चिकित्सक का इतिहास अस्पताल के पुराने कर्मचारियों से छिपा नहीं है । इनके एक सेवानिवृत्त “सवर्ण” रिश्तेदार भी 25 वर्षों तक गोरखपुर में ही कार्यरत रहते हुए अभी हाल ही में यहीं से “सेवानिवृत्त” हुए हैं । अस्पताल के गलियारों में वर्षों से एक चर्चा आम रही है…कि जैसे ही कोई नया प्रमुख “अधीक्षक” कुर्सी संभालता है…उसे “शातिर” चिकित्सक और उसके “सवर्ण” रिश्तेदार द्वारा अपने “शीशे” में उतारने का प्रयास किया जाता है । यदि अधिकारी “झुक” गया…तो ठीक…लेकिन यदि अधिकारी “रीढ़” वाला निकला…तो उसके खिलाफ “अखबारी भांडों” का मीडिया अभियान शुरू करा दिया जाता है । भ्रामक “खबरें”…आधे “सच” और “अनर्गल” आरोपों का दौर शुरू हो जाता है…ताकि अधिकारी को “संदेश” मिल जाए कि अस्पताल की असली “सरकार” कौन चलाता है । और यदि इससे भी बात न बने…तो जिला अस्पताल का “इतिहास” गवाह है कि…अधिकारी से हाथपाई भी करा दी जाती है । सबसे दिलचस्प तो यह है कि “शातिर” डॉक्टर साहब के उक्त “सेवानिवृत्त” रिश्तेदार स्वयं “भ्रष्टाचार” की जांच में दोषी ठहराए जा चुके हैं । “सेवानिवृत्ति” भी हो चुकी है… लेकिन अस्पताल के मामलों में उनकी “सक्रिय” रुचि आज भी किसी “मानद सलाहकार” से कम दिखाई नहीं देती । उनकी मर्जी चली तो ठीक नहीं तो…एक “ख़लीहर” बैठे “जनप्रतिनिधि” के सामने दस बीस हजार फेंककर “दबाव” भी बनवा दिया जाता है ।

असली घटना क्या थी ?

असल कहानी मरीजों की “दलाली” से शुरू नहीं होती…बल्कि एक ऐसे “कर्मचारी” से शुरू होती है…जो कथित रूप से “शातिर” चिकित्सक साहब का करीबी “चेला” माना जाता है । नाम है “मोहन”…लेकिन काम है “शोषण” ! दो दिन पहले इसी कर्मचारी ने जिला अस्पताल के एक “मरीज” से “सेवा शुल्क” के नाम पर 2500 रुपये मोबाइल के जरिये अपने “बैंक” खाते में प्राप्त किए । जब मामला खुला…तो उससे पूछताछ हुई । पूछताछ में चिकित्सक साहब के इस “चेले” ने भ्रष्टाचार के सारे “साम्राज्य” की बखिया उधेड़ते हुए.. एक तरफ से सबको “नंगा” करना शुरू कर दिया । उसने इस मामले में अस्पताल के भीतर और बाहर सक्रिय कई अन्य लोगों के नाम भी बताए । बस यहीं से कहानी अचानक बदल जाती है…क्योंकि जिन नामों के सामने आने से कई लोगों की मुश्किलें बढ़ सकती थीं… वहां कार्रवाई की जगह “जांच समिति” का “गठन” कर दिया गया । अब जनता भी पूछ रही है चिकित्सक साहब…कि जब पैसा सीधे “बैंक” खाते में गया है…तो “जांच समिति” आखिर क्या पता लगाएगी ? क्या अब यह जाँच करने के लिए “भारतीय रिजर्व बैंक” के “गवर्नर” को बुलाया जाएगा ? या फिर यह तय किया जाएगा कि ED को बुलाया जाए अथवा नहीं ?

सबसे बड़ा सवाल…!

यदि “मदारी” के इशारे पर नाचने वाला “दैनिक जागरण” का खबरी पत्रकार और “परम काण्डी” कोतवाली पुलिस वास्तव में पूरे “सच” तक पहुंचना चाहती है…तो विधिक प्रक्रिया के तहत “सिस्टम वेबसाइट मीडिया” से उपलब्ध “साक्ष्य” मांग सकते हैं । लेकिन प्रश्न यह है कि जिस घटना से पूरा विवाद शुरू हुआ, उसी को “खबर” से गायब क्यों कर दिया गया ?

क्या यह महज पत्रकारिता है ?

सवाल अब भी वही है कि..फिर एक बार फिर वही पुराना “खेल” आखिर क्यों खेला जा रहा है…? क्या इस बार भी निशाना नवागत “प्रमुख अधीक्षक” ही हैं ? फिर वही “खेल”…कि अपने “चेलों” के जरिये पहले “कांड” करवाओ..फिर फर्जी “खबर” छपवाओ और अधिकारी पर “दबाव” बनवाओ ! या यूं कह लें कि पहले असली “मुद्दा” दबाओ…फिर अधिकारी पर “दबाव” बनाओ…और अंततः उसे भी उसी “भ्रष्ट” व्यवस्था का हिस्सा बनने के लिए मजबूर कर दो । वास्तव में यह लड़ाई “मरीज माफिया” के खिलाफ कम और “व्यवस्था” पर कब्जा बनाए रखने की ज्यादा दिखाई देती है ।
लेकिन फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि…इस बार शायद किसी ऐसे “अधिकारी” से सामना हुआ है…जिसकी “रीढ़” फिलहाल अभी बची हुई है । और संभवतः यही बात कुछ “मक्कार” लोगों को सबसे ज्यादा “बेचैन भारत” बना रही है ।

By systemkasach

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