गोरखपुर : जिला अस्पताल प्रकरण में शिकायत में दर्ज आरोप– साइन करने से मना करने पर रिटायर लैब टेक्नीशियन ने सर्जन से कहा–”अभी 100 रुपये देंगे तो… गाँ… मरा लोगे”
यदि आपको यह अस्पष्ट और अधूरी गाली पढ़ने भर से “कोफ्त” महसूस हो रही है…तो सोचिए कि जिस “सर्जन” को तमाम कर्मियों के सामने इस तरह की स्पष्ट “गाली” सुननी पड़ी होगी..तो उस पर क्या बीती होगी ? जिला अस्पताल गोरखपुर में दो दिन पहले जो हुआ…वह सिर्फ़ “नेत्र सर्जन” डॉक्टर “अंजनी गुप्ता” पर “हमला” नहीं था… बल्कि जिला अस्पताल के “व्यवस्था” की असल “सूरत” यही है । ड्यूटी पर तैनात एक “नेत्र सर्जन” के चैम्बर में कोई बाहरी शख़्स घुसकर मारपीट कर दे… और उसके बाद भी यदि पूरी ताक़त “हमलावर” पर नहीं…बल्कि पीड़ित डॉक्टर पर खर्च किया जाने लगे…तो समझ लीजिए कि बीमारी मरीज़ों में नहीं बल्कि “निज़ाम” में है ।
नेत्र सर्जन डॉ. “अंजनी गुप्ता” ने अपनी “तहरीर” में जिस हमलावर “शख़्स” का नाम लिखा…उसके बाद उम्मीद थी कि “कानून” अपना रास्ता “अख़्तियार” करेगा । मगर अब ख़ुद “डॉ. गुप्ता” का कह रहे हैं कि “कानून” की कार्यवाही से पहले उन पर “समझौते” का दबाव “SIC साहब” और “डॉक्टर सुमन” द्वारा बनाया जा रहा है…और जब बात नहीं बन रही…तो “जाँच कमेटी” गठित करने की बात कही जा रही है । आखिर इस “हमलावर” के लिए कितनी बार समझौते का “हलाहल” विष “व्यवस्था” को अपने “हलक” में धारण करना पड़ेगा…और क्यों ? अब और कितनी बार समझौता होगा “SIC साहब” ? अपनी नौकरी के दरम्यान पूर्व “SIC” से मारपीट पर समझौता…अपने “सहकर्मी” से मारपीट पर समझौता..फिर एक अन्य “सहकर्मी” से मारपीट पर “समझौता”…किये गए “भ्रष्टाचार” पर “समझौता”..बाहरी व्यक्तियों पर किये गए “हमले” के प्रयास पर “समझौता” ! आखिर कितनी बार ?
ये कैसी जाँच कमेटी SIC साहब ?
यह कोई “विभागीय” फ़ाइल का झगड़ा नहीं है SIC साहब…या फिर यह कोई ऐसा “विभागीय” मसला नहीं है कि दो “दस्तख़त” करके इसे बंद कर दिया जाएगा । यह किसी दो “कर्मचारी” के बीच का “विवाद” नहीं है…बल्कि यह एक बाहरी व्यक्ति द्वारा “कार्यस्थल” पर कथित आपराधिक “बलप्रयोग” का मामला है । यहाँ मसला यह है कि किसी बाहरी “शख़्स” ने अस्पताल के भीतर घुसकर ड्यूटी पर तैनात “डॉक्टर” से मारपीट की है…इसलिए यह मामला आपके “विभागीय कमेटी” का नहीं बल्कि “क़ानून” का है । इलाज के लिए “ज़ख़्म” पर “मरहम” रखा जाता है…मगर यहाँ तो “ज़ख़्म” खाने वाले से ही कहा जा रहा है कि मामला यहीं “ख़त्म” कर दीजिए…और “पुलिस” वाली शिकायत वापस ले लीजिए । मतलब सवाल सिर्फ़ “हमलावर” पर नहीं…बल्कि आप द्वारा निर्मित उस पूरी “फ़िज़ा” पर है…जिसमें “मुल्ज़िम” से पहले “मज़लूम” को “फटकारा” जाता है ।
सबसे दिलचस्प ख़ामोशी उस CCTV पर है…
जिस “कैमरे” ने “सच” देखा है…वही अब तक उसे “महफ़ूज़” कराया गया है ! अगर नहीं, तो आख़िर क्यों ? क्या किसी को उस फुटेज से “ख़ौफ़” है ? या फिर “वक़्त” गुज़रने का इंतज़ार है ताकि सबूत भी “ख़ामोशी” की चादर ओढ़ ले ? कहीं ऐसा तो नहीं कि कैमरे की “आँख” खुली रह गई…इसलिए कुछ लोगों की “नींद” उड़ चुकी है ? वैसे भी जिस अस्पताल में CCTV से ज़्यादा तेज़ी से “समझौते” की फ़ाइल चलने लगती है…वहाँ इंसाफ़ की नहीं बल्कि “इंतज़ामिया” की मर्ज़ी चलती है । हालांकि “डॉक्टर गुप्ता” की शिकायत पर “कोतवाली” पुलिस आज पूछताछ करने “जिला अस्पताल” पहुँची थी…और घटना स्थल पर लगे “सीसीटीवी” को भी “खंगालने” पर चर्चा हुई है ।
ACR को आड़ में खुल्लम खुल्ला भ्रष्टाचार…
ACR का मतलब है Annual Confidential Report !यह किसी भी “सरकारी चिकित्सक” के “प्रोमोशन” और “सैलरी इंक्रीमेंट” के लिए बहुत महत्वपूर्ण रिपोर्ट होती है । नियमतः इसे हर वर्ष समय पर भेजा जाना आवश्यक होता है । “डॉक्टर गुप्ता” कहते हैं कि उनकी “ACR” भेजने की जिम्मेदारी “डॉक्टर वी के सुमन” पर है । उनकी “ACR” जानबूझकर “डॉक्टर सुमन” द्वारा पिछले चार वर्षों से नहीं भेजी गई है । “डॉक्टर गुप्ता” पहले ही यह बता चुके हैं कि उनकी “ACR” रिपोर्ट खराब करने की धमकी भी दी जाती रही है । “ACR” की आड़ में जमकर “दबाव” बनाने और वसूली करने की परंपरा पुरानी है । जिसने “माल” दिया उसका “ACR” चमकता है…और जिसने नहीं दिया वो “डॉक्टर अंजनी गुप्ता” बना दिया जाता है । क्या “डॉक्टर सुमन” से यह नहीं पूछा जाना चाहिए कि इतने वर्षों से आज तक “डॉक्टर गुप्ता” का “ACR” क्यों लंबित रखा गया है ? क्या इसीलिए पिछले 26 वर्षों से जिला अस्पताल में जमे हुए हैं “डॉक्टर वीके सुमन” ?
डॉक्टर गुप्ता ने हमले को बताया प्रायोजित..
डॉक्टर गुप्ता का कहना है कि तमाम “दबाव” तथा वर्षों तक “ACR” लटकाए जाने के बाद भी वो अपना काम नियमतः करते रहे । उसके बाद गलत तरीक़े से उनकी “सैलरी” रोक दी गयी और उसके बाद भी जब “दबाव” बनाने की “रणनीति” सफल नहीं हुई…तो अपने कथित “जँगजू” रिश्तेदार से उन पर हमला करा दिया गया । डॉक्टर “सुमन” और उनके कथित “जँगजू” रिश्तेदार पर यह आरोप कोई पहली बार नहीं लग रहा है…बल्कि इससे पूर्व जब एक “फार्मासिस्ट” ने इनके “दबाव” में आने से इंकार कर दिया था..तब उस “फार्मासिस्ट” को “साजिश” के तहत “निलंबित” भी कराया गया और उस पर “हमला” भी कराया गया था । शायद यही कारण है कि वापस “बहाल” होने पर उस “फार्मासिस्ट” ने “डॉक्टर सुमन” समेत तीन अन्य लोगो के खिलाफ “लोकयुक्त” जाँच खुलवा रखी है । डॉक्टर “सुमन” साहब कट्टर “ईमानदार” होने का दिखावा अब तक बेहतरीन “अदाकारी” के बल पर करते रहे हैं…ऐसा कहना इसलिए वाजिब है क्योंकि…ये वही “डॉक्टर साहब” हैं जिनके खिलाफ…”जिला अस्पताल” के लिए की गई “खरीद फरोख्त” में “कमीशनबाजी” और “प्राइवेट प्रैक्टिस” के “क्रिस्टल” क्लियर “सबूत” मौजूद हैं ।
SIC साहब से सवाल…

इस तस्वीर में आपके जन्मदिन पर केक काटने वाले ये वही जिला अस्पताल के वही सप्लायर हैं न “SIC साहब”…जिनकी अनियमितता भरी “अकच्च” सप्लाई लाइन की “बैतरणी” में पिछले कई वर्षों से खूब “डुबकियाँ” लगाई जा रही हैं । सवाल यह भी है “SIC साहब”…कि वह “रिटायर” व्यक्ति (हमलावर) आख़िर किस “रसूख़” के दम पर अब भी “जिला अस्पताल”/में बेख़ौफ़ घूमता है ? आखिर वह किसके “अभयदान” के “वटवृक्ष” तले डॉक्टर के “चैम्बर” तक पहुँच जाता है ? आपके “जिला अस्पताल” के किस “सफेदपोश” की “सरपरस्ती” हासिल है उसे ? क्या “रिश्तेदारी” आपसे है उस हमलावर “शख्स” की “SIC साहब”…कि आपके “चैम्बर” में बैठकर वह “भूँजा” चटनी भी खा लेता है । और घटना के बाद भी उसका हौसला इतना “बुलंद” कैसे है…कि आप उसे लेकर “समझौते” की “महफ़िलें” सजाने पीड़ित डॉक्टर के पास भी पहुँच जाते हैं । क्यों हर बार “ईमानदारी” से काम करने वालों को ही यह समझाया जाता है कि मामला यहीं “ख़त्म” कर दीजिए ? देख लीजिए कि इस बार “डॉ. गुप्ता” कह रहे हैं…कि “नौकरी” चली जाए तो चली जाए…लेकिन “इंसाफ़” से पीछे नहीं हटेंगे । अगर यह “जज़्बा” सचमुच “कायम” रहा… तो यह “लड़ाई” सिर्फ़ एक डॉक्टर की नहीं रहेगी…बल्कि यह “लड़ाई” उस पूरे “निज़ाम” के ख़िलाफ़ होगी… जहाँ “सफ़ेद कोट” पहनने वाले को भी अपने चैम्बर में “महफ़ूज़” रहने की “गारंटी” नहीं है ।
क्यों मिली थी आपको कुर्सी SIC साहब ?
आप भूल गए हैं “SIC साहब”…कि आपको अस्पताल की “हिफ़ाज़त” के लिए “कुर्सी” दी गयी थी…उसके “साख” की “नीलामी” देखने के लिए नहीं ? आपको यहाँ की “अराजकता” पर लगाम लगाने के लिए “कुर्सी” दी गयी थी…उसी “अराजक” व्यवस्था का हिस्सा बनने के लिए नहीं ! जिला अस्पताल में चल रहे “नेक्सस” को “खंडित” करने और “भ्रष्टाचार” की “जड़” पर प्रहार करने के लिए आपको “कुर्सी” दी गयी थी…उसी “आकंठ भ्रष्टाचार” के “वाहकों” और “नेक्सस” का “पैरवीकार” बनने के लिए नहीं । आज तक आप पर वह सवाल अभी भी जिंदा है “SIC साहब”…कि “मरीज” से इलाज के नाम पर ढाई हजार रुपये अपने खाते में लेने वाले कर्मचारी “मोहन” को आपके द्वारा “अभयदान” आखिर किस विशेष कृपा के तहत दिया गया ? आपके इन्ही “कारनामो” का नतीजा है कि…आज “जिला अस्पताल” में ऐसा “माहौल” दिखाई दे रहा है…जहाँ “ईमानदारी” से काम करने वाला डॉक्टर ख़ुद को “तन्हा” महसूस करता है…जबकि “रसूख़” और “रिश्तेदारी” पर सवाल उठते ही पूरी “मशीनरी” समझौते जैसी “हरकत” में आ जाती है । आखिर “कर्मदण्ड” की इस तपती “दोपहरी” में आप अपने पैर क्यों “झुलसाने” पर उतारू हैं ? इंसाफ़ का गला हमेशा “हथियार” से नहीं घोंटा जाता “SIC साहब”…बल्कि कभी कभी उसे “समझौते” “कमेटी” और “दबाव” के मुलायम “लफ़्ज़ों” से भी “दफ़्न” करने की कोशिशें की जाती हैं

