गोरखपुर : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यशैली पर आईना दिखाते हुए बेहद “तल्ख” टिप्पणी की है कि…पुलिस स्टेशन अब “न्याय” के “मंदिर” न रहकर शुद्ध रूप से “व्यावसायिक गतिविधियों” और “अवैध कमाई” के “अड्डे” बन चुके हैं । यह टिप्पणी “कोरी बयानबाजी” नहीं…बल्कि “व्यवस्था” के “माथे” पर लगा एक “कलंक” है । पूरे “सूबे” को छोड़िए…और सिर्फ “मुख्यमंत्री” के गृह जनपद गोरखपुर की ज़मीनी हकीकत पर नज़र दौड़ा लीजिए…तो “हाईकोर्ट” के इस कथन और यहाँ के “थानों” के कारनामों में आपको ज़रा भी “फर्क” नहीं मिलेगा ।
कोतवाली थाना : संवेदनहीनता और दरिंदगी की इंतहा !
ज़रा महसूस कीजिए उस दस साल की “मासूम” की “मनोदशा” को…जो “कोतवाली” थाने की “आपराधिक निष्क्रियता” और एक खाकीधारी की “दरिंदगी” की भेंट चढ़ गई । शहर भर ने देखा कि समय पर की गई एक छोटी सी कार्रवाई इस “नासूर” को रोक सकती थी… लेकिन थाना प्रभारी “छत्रपाल साहब” भला वक्त पर “हरकत” में क्यों आते ? क्या ऐसी घटनाओं को रोकने से “अंटे” थोड़े न “गरम” होते हैं ? यहाँ तो “दस्तूर” ही दूसरा है ! यहाँ तो फर्जी मुकदमों का “ताना बाना” बुनने में ही असली “मुनाफा” है ! यही वजह है कि “छत्रपाल साहब” को अपनी कुर्सी की “तासीर” ऐसी भाई…कि वे बगैर सिर पैर के मामलों में भी मनगढ़ंत मुकदमे जड़ने में “माहिर” हो गए । अब कोई भला बेवजह की “जहमत” क्यों उठाए ? एक पुरानी कहावत है कि “मातहत” तभी “खौफ” खाता है जब उसका “अफसर” ईमानदार हो । इसलिए “छत्रपाल साहब” डरें भी तो क्यों ? जब वे बरसों से देख और जान रहे हैं कि उनके क्षेत्राधिकारी (CO) महोदय खुद “बदमाशों” और “अय्याशों” को “संरक्षण” देने में अपनी पूरी निष्ठा “कुर्बान” करने पर उतारू हैं…तो फिर नीचे वाला क्यों “पीछे” रहे ? आखिर “माल” किसे पसंद नहीं ?
ऐसा लगता है जैसे तीन चार दिन पहले जिला अस्पताल में घटी “घटना” भी “माल” का ही इंतजार कर रही है ! जिला अस्पताल के “नेत्र सर्जन” कूट दिए गए…मगर अभी तक “कोतवाली” की “अंगड़ाई” नहीं टूटी ! “तहरीर” मिलने के घंटों बाद भी न तो “सीसीटीवी” फुटेज का अता पता है…और न ही “मुकदमा” दर्ज होने की कोई “सूचना” है । पीड़ित डॉक्टर उस “कोतवाली” पुलिस से जान माल की “गुहार” लगा रहा है…जिसके “कान” की ढेपियाँ “सिक्कों” की “खनखनाहट” से ही खुलते हैं । इस घटना से “मंडल” से लेकर “प्रदेश” तक के “अधिकारी” सकते में हैं ! गोरखपुर के “मंडल” अधिकारी तो कार्यवाही के लिए “पत्र” भी लिख चुके हैं…लेकिन वाह रे कोतवाली “पुलिसिया” तंत्र !

इन सबसे इतर सबसे ज्यादा “हैरतंगेज” बात तो यह है कि…इस “पुलिसिया तंत्र” से भी दस “कदम” आगे एक और “विशिष्ट थेथर तंत्र” है…जो दिन भर जिला अस्पताल की “चौखट” पर बैठकर मुफ्त की “मलाई” और “सरकारी बिस्कुट” तोड़ने में “मशगूल” रहता है । हम बात कर रहे हैं शहर के उन “अखबारों” और उनके “नुमाइंदों की…जिन्होंने अपने “मुँह” से लेकर अपने “अंग” विशेष तक “सरकारी बिस्कुट” ठूँस रखे हैं ।
“प्रेतों के परमात्मा” और उनकी मूक “पत्रकारिता”…
प्रेतों का यह “परमात्मा” कभी दिन भर जिला अस्पताल की “बाउंड्री” पर…कभी पाकड़ पर..तो कभी आम पर… तो कभी पीपल के पेड़ों पर “उल्लू” की तरह चुपचाप बैठा रहता हैं । भले ही चैम्बर में “डॉक्टर” को कोई “गुंडा” सरेआम कूटकर चला जाए… या फिर डॉक्टर महोदय खुद ही “जिला अस्पताल” की पूरी “स्वास्थ्य व्यवस्था” और “दवाइयों” को “हराम का माल” समझकर अपनी “तिजोरी” में “घोंट” जाएं…लेकिन “प्रेतों के परमात्मा” की सेहत पर एक “जूँ” तक नहीं रेंगती ! लेकिन यदि किसी “भ्रष्ट बाबू” “घूसखोर अधिकारी” या “अस्पताल” के किसी “हरामखोर नुमाइंदे” को गलती से भी हल्की सी “छींक” आ जाए…तो ये “प्रेतों का परमात्मा” पूरे “अखबार” पर “हग” मारता है ! चोट्टों को छींक आते ही बड़े बड़े संपादकीय, सहानुभूति के लंबे चौड़े “लेख” और “दलाली” के ऐसे “फव्वारे” छूटते हैं कि “शर्म” भी “शर्म” के मारे “पानी पानी” हो जाये ।
शाहपुर थाना : फर्जीवाड़े के खुद बने मुहाफ़िज़ !
अब रुख करते हैं “शाहपुर” थाने का ! यहाँ के “थानेदार” साहब के कारनामे भी किसी “दास्तान” से कम नहीं थे ! वर्ष 2024 में “माल” मिला तो “अवैध निर्माण” और अवैध कब्जों के “संरक्षकों” को बचाने के चक्कर में साहब ने इतनी फुर्ती दिखाई…कि “संरक्षण” की “जमीन” तैयार करने में खुद ही फर्जी मुकदमों के “जाल” में उलझ कर रह गए । स्थिति यह है कि “थाना” छोड़ने के बाद भी यह “मुद्दा” थानेदार साहब की “जान” नहीं छोड़ रहा है । दैनिक “अखबार” के अखबारी धुरंधर “खबीस पांडेय” को लेकर कोर्ट द्वारा रिपोर्ट मांगे आठ महीने बीत चुके हैं…लेकिन फर्जी “मुकदमे” लिखने में “मास्टर ब्लास्टर” बन चुकी शाहपुर पुलिस के हाथ “रिपोर्ट” लिखने में अब तक “काँप” रहे हैं…आखिर क्यों ?
कैंट थाना : दरगाही फॉर्मूले की थेथरई का असर !
अब जरा “कैंट” थाने के कारनामों की “फ़ेरहिस्त” भी देखिए । वकीलों के खिलाफ महज़ एक “दरख्वास्त” मिलते ही एससी/एसटी एक्ट का ऐसा अचूक “नुस्खा” आजमाया कि तड़ से “मुकदमा” दर्ज कर दिया । लेकिन असली “दास्तान” तो “दरगाह” के “सड़ांध” मारती उस “मक्कारी” की है…जिसे बिना पहचाने और परखे “अंजाम” दिया गया । “दरगाह” की एक पुरानी और “दिलअज़ीज” “कनीज़” की मामूली “दरख्वास्त” पर…नौ महीने पुरानी “घटना” के तमाम “तथ्यों” और “अंतर्विरोधों” को ताक पर रखकर…बिना किसी तकल्लुफ़ के पत्रकारों और एक संपादक पर डकैती, अपहरण और हत्या के प्रयास जैसी गंभीर धाराओं का ऐसा “बवंडर” खड़ा किया गया…कि अधिकारियों ने भी अपना “माथा” पीट लिया । कहीं यह “मुकदमा” करोड़ों की “वक्फ जमीन” बेचकर “डकार” लेने वालों…और “दरगाह” की आड़ में काले कारनामों को “अंजाम” देने वाले “अय्याशों” को लगे हुए “घांवों” का “प्रकोप” तो नहीं ? मैंने इस “मुकदमे” के पीछे छिपे “घिनौने चेहरों” की “पहचान” के लिये थानेदार “कैन्ट” से और थानेदार “कोतवाली” से उनके थानों की “सीसीटीवी” माँगी है…कम से कम उसे तो दे दीजिए ! इसमें “ऐतराज” कैसा ? सीसीटीवी माँगी है “जनाब”…आपके “थानों” में आ रही “धुआँधार” “डोनेशन” का “ब्योरा” थोड़े न माँगा है…जो आप “बेतकल्लुफ” हुए जा रहे हैं !अब तो “कैंट” थानेदार साहब से यह भी “गुजारिश” है…कि जरा उस वाली “दरख्वास्त” पर भी मुकदमा दर्ज कर ही लीजिए ! अरे…वही वाली…जो अभी चंद रोज़ पहले “प्रेस क्लब” से आपके थाने की “देहरी” तक पहुँची है !
प्रेस क्लब : पियक्कड़ई के नए आयाम और गालियों का गरुड़ पुराण…
वैसे भी, इस बार “प्रेस क्लब” की नई कार्यकारिणी ने “मयखानों” और “पियक्कड़ई” के सारे पुराने रिकॉर्ड “ध्वस्त” कर डाले हैं । किस्सा कुछ यूँ है कि जब रात्रि के “पहर” में “सुरूर” परवान चढ़ा…तो “प्रेस क्लब” के “पुस्तकालय मंत्री” महोदय ने अपनी “गालियों” की “मुकद्दस” पुस्तक खोल दी । अब जब “पुस्तक” खुल ही चुकी थी…तो भला “गालियों” का “गरुड़ पुराण” कैसे नहीं सुनाया जाता ? फोन पर एक दूसरे “पत्रकार” को अति विशिष्ट श्रेणी की ऐसी “गालियाँ” बकी गईं…कि गाली सुनने वाले पत्रकार महोदय को अपनी इस “इज्जत अफजाई” से “कोफ्त” महसूस होने लगी । पत्रकार महोदय ने मजबूरन थाना “कैंट” की शरण ली । पुलिस के हरकत में आते ही, गालीबाज़ “पुस्तकालय मंत्री” की “नुमाइंदगी” करने और “प्रेस क्लब” की लुट चुकी “आबरू” ढांपने के लिए “पत्रकारिता भवन” के कुछ “नुमाइंदे” दौड़ पड़े । जब यह “पैंतरा” भी काम नहीं आया और “रौब” झाड़ने की सारी कोशिशें नाकाम हो गईं…तो “दरगाही” फॉर्मूले की “थेथरई” वाली तलवार “म्यान” से बाहर खींच ली गई । “भौकाल” टाइट करने के लिए “प्रेस क्लब” का “पन्ना” निकाला गया…और “पुस्तकालय मंत्री” जी ने झट से सनसनाते हुए एससी/एसटी “अस्त्र” का “संधान” कर डाला । सच पूछिए तो इस वक्त “प्रेस क्लब” पर “दरगाही” थेथरई का ऐसा गहरा “खुमार” छाया हुआ है…कि यदि यहाँ के दो चार पदाधिकारी “महिला” होते…तो हर हफ्ते शहर के थानों में “छेड़खानी” और “इज्जत” लुटने के नए नए झूठे “मुकदमे” लिखवाते नजर आते !
लोकतंत्र के लुटे हुए खंभों से सवाल…!
“अखबार” और “समाचार” लिखने वाले उन “लोकतंत्र” के “लुटे” हुए “खंभों” से कहना चाहता हूँ…कि “जेल” से “कैदी” भागने पर…”मासूम” बच्ची के साथ “दरिंदगी” पर या खराब “पुलिसिंग” पर बहुत “हल्ला” मत मचाईये । क्योंकि यहाँ सिर्फ “पुलिसिंग” का हाल खराब नहीं है…बल्कि उससे कहीं ज्यादा खराब “हाल” आपका है ! “हनीट्रैप गैंग” चलाने से लेकर “जमीन” कब्जा करने तक…और “अय्याशी” से लेकर “दलाली” तथा “पियक्कड़ई” तक के सारे “गुणवान” लोग आपके “पत्रकारिता भवन” में ही पाए जाते हैं । फिर ये हो “हल्ला” क्यों ? झूठे मामलों में कार्यवाही का दबाव बनाने से लेकर “ट्रांसफर” पोस्टिंग की “मलाई” खाने तक…और “सही” मामलों को “दफन” करने में दिखाई गई आपकी “बेहयाई” तक…सब कुछ आपका ही तो किया धरा है…फिर आज ये “रांड रूदन” क्यों ? “रांड” “रम” और “रोहू” की महफिलों से “दरगाह” पर आपने ही तो “रौनक” फैलाई है…फिर आज ये “हाय तौबा” क्यों ?
“तंज” कसना और “आईना” दिखाना ही “पत्रकारिता” का असल “धर्म” है…बशर्ते “खाकी” और “कलम” के सौदागर अपने निहित स्वार्थों को “ताक” पर रखकर “इंसाफ” का “दामन” थाम सकें । वरना गोरखपुर के थानों की इस “चक्की” में पिसता हुआ “आम आदमी” सिर्फ यही कहेगा…कि यहाँ “मुकदमों” और “मक्कारियों” की “फेहरिस्त” तो लंबी है…लेकिन इंसाफ का पता नहीं ! बचपन में “बी आर चोपड़ा” का “टीवी सीरियल” “महाभारत” शुरू होने से पहले एक “आवाज़” आती थी ! मैं “समय” हूँ…मैं “दुर्योधन” का “अहंकार” भी देखता हूँ…मैं “अर्जुन” का “धैर्य” भी देखता हूँ ! मैं “कुर्सी” का “मद” भी लिखता हूँ…और “सत्य” की “जीत” भी ! मैं “गांधारी” का “पतिव्रत” भी देखता हूँ…और “शकुनि” की “मक्कारी” भी ! क्योंकि मैं “समय” हूँ !

