गरूड़ पुराण भाग-2 : प्रेस क्लब के मयखाने से निकली गालियाँ सुरूर नहीं…बल्कि ईमानदारी के शोषण की चीख थी !

गोरखपुर : कहते हैं कि कभी कभी आधी “हकीकत” और आधा “फसाना” ही किसी खबर को “हिट” बनाता है । लेकिन जब “खबर” में “शराब” की जगह “शोषित के बेबसी” की “एंट्री” होती है…तो “कहानी” का “मिज़ाज” बदल जाता है ! कल “सिस्टम वेबसाइट मीडिया” पर “प्रेस क्लब’ के” मयखाने’ से निकला “गालियों का गरुड़ पुराण”‘ और “कैंट थाने” की दौड़ भाग पर एक खबर प्रकाशित की गई थी । लेकिन जब इस पूरे “हंगामा-ए-खास” पर “निष्पक्षता” के तहत गहराई से पड़ताल करते हुए… “पुस्तकालय मंत्री” जी से किसी अन्य के जरिये संपर्क साधा गया…तब इस “सिक्का-ए-विवाद” का वो दूसरा “पहलू” भी सामने आया…जिसे शराब के “सुरूर” में दबा दिया गया था !

जब “सिस्टम वेबसाइट मीडिया” ने टटोली नब्ज…

“ग़ालियों के गरुड़ पुराण” की इस सनसनी के पीछे की असली वजह जानने के लिए जब “सिस्टम वेबसाइट मीडिया” ने “पुस्तकालय मंत्री” जी से किसी अन्य के जरिये संपर्क साधा…तो बात “शराब” के “हैंगओवर” से निकलकर एक “ईमानदार” पत्रकार के “आर्थिक शोषण” पर आ टिकी । “पुस्तकालय मंत्री” जी का कहना है कि उन्होंने “पत्रकारिता” के दौरान “दलाली” या “अवैध कमाई” का सहारा कभी नहीं लिया…और हमेशा अपनी “आजीविका” ईमानदारी से चलाने का प्रयास किया है । यही कारण है कि उनकी “आर्थिक” स्थिति बहुत मजबूत नहीं है । उनके अनुसार…पूरे विवाद की “पृष्ठभूमि” केवल “सैलरी” बकाया भुगतान और उससे उपजे “तनाव” से जुड़ी थी…न कि किसी निजी “वैमनस्य” या “दुर्भावना” से !

6,000 रुपये का बकाया मेहनताना और बच्चों के भविष्य का तनाव…

पता चला कि “पुस्तकालय मंत्री” जी का गुस्सा किसी अकारण “सुरूर” का नतीजा नहीं था…बल्कि “सैलरी” बकाया भुगतान को लेकर किये जा रहे “उत्पीड़न” का था । “दलाली” से कभी तालमेल न रखने वाले मंत्री जी का करीब 6,000 रुपये का जायज “मेहनताना” “गोरखपुर खबर” नाम के पोर्टल पर बकाया था । “अभय राव” ने अपने आपको इस “पोर्टल” का मालिक बताते हुए मंत्री जी से मेहनत कराई…और काम कराने के बाद “तनख्वाह” के कुछ पैसे “डकार” लिए । बार बार फोन करने पर जब बात आगे बढ़ी…तो पत्रकार “रत्नेश पांडेय” प्रकट हुए और स्वयं को भी “गोरखपुर खबर पोर्टल” का दूसरा “मालिक” बताते हुए बकाए “भुगतान” का “आश्वासन” दिया । मेहनताना तो नहीं मिला…लेकिन आश्वाशन की “घुट्टियाँ” रत्नेश पांडेय द्वरा लगातार पिलाई जाती रही । एक तरफ बच्चों के स्कूल में “एडमीशन” और “फीस” का सिर पर मंडराता “तनाव”…और दूसरी तरफ पैसे माँगने पर बार बार फोन काटने और समय देकर टालमटोल करने की “थेथरई” ने मंत्री जी के “सब्र” के “बाँध” को तोड़ दिया । जब मंत्री जी ने “हक” का पैसा मांगने के लिए आखिरी बार फोन लगाया…तो दूसरी तरफ से रत्नेश द्वारा की गई “बदतमीजी” ने मंत्री जी की “खुद्दारी” को बुरी तरह से झकझोर कर रख दिया ।

गाली जायज नहीं, पर शोषण भी सही नहीं !

मैं “प्रेस क्लब” की “गरिमा” की बात तो नहीं करता…क्योंकि वहाँ इस नाम की “महिला” ने वर्तमान “कार्यकारिणी” के आते ही अपना “त्यागपत्र” दे दिया था । परंतु “पत्रकारिता” की “गरिमा” के बीच “तनाव” और “झल्लाहट” में जो शब्द “उकेरे” गए…उन्हें किसी भी सूरत में “सभ्य” नहीं ठहराया जा सकता । लेकिन उससे भी अहम सवाल यह भी है…कि अपने ही “खून पसीने” की कमाई के लिए किसी “ईमानदार” पत्रकार को बुरी तरह से “बेबस” और “जलील” कर देना भी निहायत ही घटिया “हरकत” है ।

मतलब ये…कि कल तक जिस प्रकरण में “प्रेस क्लब” की फिज़ाओं में गूँज रहे “गालियों के गरुड़ पुराण” और कैंट थाने के पैंतरों की गूँज थी…अब उसी कहानी में एक “भावुक मोड़ आ चुका है । उस रात जो “मुकद्दस” गालियों की बौछार हुई थी…उसकी पटकथा “शराब” की बोतल के पीछे से नहीं…बल्कि एक “बेबस बाप” की “लाचारी” में लिखी गई थी । जो बातें अब सामने आई हैं…वो बताती हैं कि “पुस्तकालय मंत्री” जी किसी “सुरूर” में नहीं…बल्कि बच्चों के “एडमीशन” के तनाव में थे । ईमानदारी की पत्रकारिता की “रोटी” खाने वाले “मंत्री जी” को…अपने 6,000 रुपये के जायज “मेहनताने” में से…बार बार गिड़गिड़ाने के बाद भी अब तक केवल 2400 रुपया ही प्राप्त हुआ है । “मंत्री जी” का जायज मेहनताना एक ऐसे महोदय “डकार” कर बैठे हैं…जो खुद भी “पत्रकार” ही हैं । फोन न उठाना… टालमटोल करना और आख़िरकार फोन उठाकर “रौब” ग़ालिब करने की “थेथरई” ने मंत्री जी के “सब्र” का प्याला “छलका” दिया था । माना कि ​गाली “जायज” नहीं थी…पर मंत्री जी की “बेबसी” भी झूठी नहीं है । क्या अपनी मेहनत का “हक” माँगना और उस पर “बदतमीजी” सहना किसी “ईमानदार” पत्रकार की “नियति” है ? इसलिए जब “दलाली” से कोसों दूर रहने वाले एक “पत्रकार” का खून पसीना अटकेगा…तो “भाषा” का “संयम” भी टूट ही जायेगा । बहरहाल, कैंट थाने की पुलिस दिग्गज गालियों का “हिसाब’ भले कर लें…लेकिन क्या कोई उस “शोषण” पर भी “उंगली” उठाएगा जिसकी वजह से यह “गरुड़ पुराण” रचा गया ?

और चलते-चलते एक जरूरी बात…

माफ कीजिएगा “पुस्तकालय मंत्री” जी ! मौजूदा दौर में बिना पुख्ता “तथ्यों” और “सबूतों” के खबरें चलाना “पत्रकारिता” की “रीढ़” पर “कुल्हाड़ी” मारने जैसा है । यही वजह है कि जब हमारी “टीम” के “नुमाइंदे” ने अपनी “पहचान” छिपाते हुए…जब आपसे संपर्क साधा…तो “निष्पक्षता” और “साक्ष्यों” की सुरक्षा के तहत आपके इस पूरे “मार्मिक वक्तव्य” का एक एक “शब्द” हमारे “रिकॉर्डर” में दर्ज कर लिया गया। यह कदम किसी पर “सवाल” उठाने के लिए या “रिकॉर्डिंग” को “प्रसारित” करने के लिए नहीं… बल्कि “पत्रकारिता” के उस ऊँचे “उसूल” और अपनी “विश्वसनीयता” को “बरकरार” रखने के लिए उठाया गया है…ताकि कल को कोई “सिस्टम वेबसाइट मीडिया” की “खबर” पर “उंगली” न उठा सके !

By systemkasach

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का खुद का चेहरा कितना विद्रूप और घिनौना है..ये आप इस पेज पर देख और समझ सकते हैं । एक ऐसा पेज, जो समाज को आईना दिखाने वाले "लोकतंत्र के चौथे स्तंभ" को ही आइना दिखाता है । दूसरों की फर्जी ख़बर छापने वाले यहाँ खुद ख़बर बन जाते हैं ।

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