लंदन के The Economist में ‘Top Secret’ और अभिषेक उपाध्याय का जिक्र खोजी पत्रकारिता के लिए एक बड़ी तस्दीक है । पत्रकारिता की दुनिया में सबसे बड़ा इनाम केवल TRP, व्यूज़ या सब्सक्राइबर नहीं होता, बल्कि यह होता है कि आपकी खोजी रिपोर्टिंग को दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित मीडिया भी गंभीरता से ले
लंदन से प्रकाशित विश्वप्रसिद्ध पत्रिका The Economist ने 6 अगस्त 2026 को प्रकाशित अपने लेख “A temple scandal rocks India’s ruling party” में भारतीय स्वतंत्र डिजिटल मंच Top Secret और उसके संचालक अभिषेक उपाध्याय का स्पष्ट उल्लेख किया है । किसी छोटे भारतीय स्वतंत्र डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म के लिए यह केवल एक ज़िक्र नहीं, बल्कि उसकी खोजी पत्रकारिता की तस्दीक और एतबार का प्रतीक है ।

The Economist ने अपने लेख में लिखा है कि मंदिर प्रबंधन से जुड़े कथित चढ़ावा/दान घोटाले के आरोपों को सबसे पहले जून 2026 की शुरुआत में Top Secret ने सार्वजनिक किया था । पत्रिका ने यह भी उल्लेख किया कि अभिषेक उपाध्याय के अनुसार एक व्हिसलब्लोअर ने जांच एजेंसियों को ऐसे दस्तावेज़ और जानकारियां उपलब्ध कराई हैं, जिनमें मंदिर निर्माण प्रक्रिया में कथित भ्रष्टाचार तथा निर्माण लागत में भारी वृद्धि के आरोप शामिल हैं ।
यह भी उल्लेखनीय है कि बाद की घटनाओं में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा एसआईटी गठित की गई, एफआईआर दर्ज हुई, कई लोगों की गिरफ्तारी हुई और मंदिर ट्रस्ट के कुछ पदाधिकारियों ने इस्तीफे दिए । हालांकि मामले की जांच अभी जारी है और अंतिम निष्कर्ष आना शेष है ।
इस पूरी घटना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि एक स्वतंत्र भारतीय डिजिटल मंच द्वारा उठाए गए मुद्दे को दुनिया की सबसे प्रभावशाली पत्रिकाओं में से एक ने अपने विश्लेषण में स्थान दिया । यह केवल किसी एक पत्रकार की उपलब्धि नहीं, बल्कि उस पत्रकारिता की साख, माक़बूलियत और अहमियत की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृति है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद सत्ता, व्यवस्था और प्रभावशाली संस्थाओं से जुड़े सवाल उठाने का साहस रखती है ।

आज जब पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा शोर, सनसनी और स्टूडियो बहसों के बीच उलझा दिखाई देता है, ऐसे समय में यह उदाहरण याद दिलाता है कि मजबूत दस्तावेज़, ठोस तथ्य और लगातार की गई खोजी मेहनत अब भी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच सकती है ।
यह उपलब्धि केवल Top Secret या अभिषेक उपाध्याय की नहीं, बल्कि उस पूरी खोजी पत्रकारिता की है जो सीमित संसाधनों के बावजूद सच की तलाश में जुटी रहती है। अगर किसी छोटे स्वतंत्र मंच की रिपोर्टिंग को The Economist जैसा वैश्विक प्रकाशन उद्धृत करता है, तो यह इस बात का संकेत है कि अच्छी पत्रकारिता की आवाज़ सीमाओं की मोहताज नहीं होती ।

