धर्म और विकास के नाम पर वोट लेकर मिला छलावा…निजी हित में नई प्लॉटिंगों पर सरकारी धन लुटाने के आरोप ! वार्ड-17 के निवासियों ने उठाए गंभीर सवाल

गोरखपुर : वार्ड नंबर 17 पादरी बाजार से विकास के “अनोखे मॉडल” की शिकायत “नगर आयुक्त” तक पहुँची है । मतलब जहाँ “जनता” रहती है…वहाँ “सड़क” नहीं…और जहाँ “प्लॉट” बिकने हैं…वहाँ “आरसीसी” तैयार ! स्थानीय जानकार बताते हैं कि जिन “प्लाटों” की कीमत आरसीसी सड़क बनने से पूर्व महज “15 सौ” रुपये स्क्वायर फीट थी…वहाँ “आरसीसी” सड़क बनते ही रेट “4 हजार” स्क्वायर फीट के पार चला गया । तो क्या “विकास” के नाम पर सरकारी धन से “प्लाटिंग” के धंधे का नया व्यवसायिक “तंत्र” विकसित हो रहा है ?

वार्ड संख्या-17 (स्टर्नपुर – कथित पत्रकार कॉलोनी एवं शर्मा कॉलोनी, पादरी बाजार) के स्थानीय निवासियों ने नगर निगम गोरखपुर और क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि के खिलाफ “मोर्चा” खोल दिया है । क्षेत्र के नागरिकों का आरोप है कि “चुनाव” के समय “हिंदुत्व” और “सर्वांगीण विकास” के नाम पर “वोट” बटोरा गया… लेकिन “पार्षदी” में आते ही “जनता” की उम्मीदों पर पानी फेरकर सिर्फ चुनिंदा कथित भूमाफियाओं की “प्लॉटिंग” को चमकाने का काम किया जा रहा है । ​सामूहिक प्रार्थना पत्र के माध्यम से “नगर आयुक्त” को भेजी गई शिकायत में क्षेत्रवासियों ने “पार्षद” और “ठेकेदार” की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं । निवासियों का कहना है कि कथित पत्रकार कालोनी व शर्मा कॉलोनी स्टर्नपुर की 15 फीट चौड़ी मुख्य सड़कें सालों से बदहाल हैं…जहाँ “बरसात” में घुटनों तक पानी भर जाता है और “विषैले” जीव जंतुओं का खतरा बना रहता है । लेकिन पुरानी घनी आबादी की उपेक्षा कर…दूरदराज स्थित नई “प्लॉटिंगों” तक प्राथमिकता के आधार पर सरकारी खर्च से चमचमाती आरसीसी “सड़कें” और “स्ट्रीट लाइटें” पहुँचाई जा रही हैं ।

विकास’ की नई परिभाषा: जनता गड्ढे में, और विशेष “प्लॉटिंग” पर सरकारी “आरसीसी”

जनता आहत इसलिए है कि “विकास” के नाम पर “वोट” बटोरा गया…लेकिन “चुनाव” जीतते ही सेवा किसकी शुरू हो गई ? व्यावसायिक “उपक्रम” के उन कथित “भूमाफियाओं” की जो नई नई “प्लॉटिंग” बेच रहे हैं ! पादरी बाजार जब “नगर निगम” क्षेत्र के दायरे में आ चुका है…तो अब आम जनता को “टैक्स” भरना पड़ेगा…लेकिन जब सुविधाओं की बात देखें तो स्टर्नपुर के कथित पत्रकार कॉलोनी और शर्मा कॉलोनी की 15 फीट की सड़क घुटनों तक भरे पानी, कीचड़, जहरीले कीड़ों और गड्डों के हवाले छोड़ दिया गया है । यहाँ की “जनता” को बुनियादी हक माँगने पर सिर्फ “आश्वासन” का झुनझुना थमा दिया जाता है ! लेकिन इसी वार्ड में “आबादी” से दूर ऐसे नए “प्लॉटिंग” तक “आरसीसी” सड़क और “पथ प्रकाश” पहुँच चुका है…जहाँ “आबादी” की जगह जमीन की “व्यावसायिक गतिविधियाँ” कुलाँचे भर रही हैं ।जनता का “सवाल” वाजिब है कि अब सरकारी विकास उन जगहों पर होगा जहाँ आम “जनता” रहती है…या फिर उन जगहों पर…जहाँ प्रभावशाली लोगों की “प्लॉटिंग” बिक रही है ?

अगर जनता की शिकायत गलत है तो कागजात सामने रखिये 

वार्डवासियों की शिकायत में यह गंभीर “सवाल” उठाया गया है कि वर्षों से “आबाद” क्षेत्र मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं…जबकि “आबादी” से दूर नई “प्लॉटिंग” तक “आरसीसी” सड़क और “पथ प्रकाश” जैसी सुविधाएँ पहुँचाई गई है । इस स्थिति में “जनता” को यह जानने का पूरा अधिकार है कि…किसके “प्रस्ताव” पर काम हुआ ? किसने “स्वीकृति” दी ? कितना बजट “स्वीकृत” हुआ ? किस “ठेकेदार” को काम मिला ? किसके “बिल” पास हुए ? “माप” पुस्तिका में कितना काम दर्ज है ? और सबसे महत्वपूर्ण यह कि क्या यह सब कुछ “नियमों” के अनुसार हुआ ? क्योंकि सवाल किसी “जाति” का नहीं है…बल्कि सवाल यह है कि सार्वजनिक “धन” का इस्तेमाल सार्वजनिक “जरूरत” के आधार पर किया गया…या कुछ प्रभावशाली “प्लॉटिंग” कारोबारियों के हित में ?
अगर सब कुछ नियम के मुताबिक हुआ है तो कागजात सामने रखिए ! आखिर जनता को भी तो पता चले कि यह “विकास” है या “विकास” के नाम पर कुछ लोगों के “प्लॉट” की कीमत बढ़ाने की “सरकारी व्यवस्था” !

10 लाख के बजट का मास्टरस्ट्रोक और ठेकेदारी का अनोखा खेल !

“​भ्रष्टाचार” करने वालों ने भी क्या खूब “तरकीब” निकाली है ! ज्यादातर निर्माण प्रस्तावों को जानबूझकर 10 लाख रुपये के “बजट” के नीचे रखा जाता है !”आरसीसी” सड़क और “नाली” सामान्यतः एक साथ बननी चाहिए…लेकिन यदि “सड़क” और “नाली” का बजट 10 लाख से ऊपर जा रहा है तो काम को दो अलग अलग “टुकड़ों” में कराया जाता है…ताकि “टेंडर प्रक्रिया” में ई-टेंडरिंग के “झंझट” से बचा जा सके…और नियम कानूनों को दरकिनार कर “ऑफलाइन” प्रक्रिया के रास्ते मनपसंद और “जी हुजूरी” करने वाले किसी भी ऐरे गैरे को “ठेकेदार” घोषित कर बिंदास “माल” कूटा जा सके ? हालत यह है कि ऐसे व्यक्तियों को “आरसीसी” सड़क बनाने का ठेका थमा दिया गया… जिन्होंने “जिंदगी” में आज तक एक “चबूतरा” तक नहीं बनाया ! अगर यह आरोप गलत है नेता जी…तो आपको बहुत आसान काम करना चाहिए ! हर निर्माण कार्य की स्वीकृत लागत, प्रस्ताव, टेंडर,कोटेशन प्रक्रिया, ठेकेदार की पात्रता, पूर्व अनुभव, एग्रीमेंट, माप पुस्तिका, भुगतान बिल और गुणवत्ता जांच की रिपोर्ट सार्वजनिक कर दीजिए…”दूध” का “दूध” और “पानी” का “पानी” हो जाएगा । और अगर जाँच में सामने आता है कि कार्य की लागत जानबूझकर छोटी रखकर “प्रक्रिया” को “माल” कूटने के लिए प्रभावित किया गया…तो फिर जिम्मेदारी सिर्फ ठेकेदार की नहीं होनी चाहिए…बल्कि नेताजी की भी होनी चाहिए । जिसने “प्रस्ताव” बनाया…जिसने “स्वीकृत” किया…जिसने “ठेका” दिया…जिसने “माप पुस्तिका” प्रमाणित की और जिसने “भुगतान” कराया…सबके “भूमिका” की जाँच होनी चाहिए ।

क्या यही है विकास का स्वर्णिम काल ?

विकास के “स्वर्णिम काल” का “स्वप्न” दिखाकर “ठगी” गयी वार्ड नंबर 17 की “जनता”…अब “अव्यवस्था” और “बदहाली” से पूरी तरह से “ऊब” चुकी है । “जनता” अब यह कह रही है…कि जब “हिंदुत्व” और “विकास” के नाम पर “वोट” लिया था…तो “प्लाटिंग” के “धन्धे” के नाम पर “हिसाब” मत भूलिए ! “जनता” ने “प्रतिनिधि” इसलिए नहीं चुना था कि कुछ चुनिंदा लोगों की “प्लॉटिंग” का “धंधा” चमके…बल्कि इसलिए चुना था कि उनकी “आशाएं” और “उम्मीदें” परवान चढ़ें ! वार्ड नंबर 17 की “जनता” कह रही है “नेताजी”…कि “कुर्सी” मिल जाने पर “इंसान” अक्सर “अहंकार” के “नेशनल हाइवे” पर बिना “ब्रेक” वाले उस “ट्रक” की तरह “बेलगाम” हो जाता है…जिसे एक न एक रोज “नियति” के “चट्टान” के आगे “मकई” के दानों की तरह “बिखर” जाना पड़ता है ।

वार्ड निवासियों द्वारा दिए गए शिकायती पत्र देखने के लिए क्लिक करें….➡️ कंप्लेन PDF

By systemkasach

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का खुद का चेहरा कितना विद्रूप और घिनौना है..ये आप इस पेज पर देख और समझ सकते हैं । एक ऐसा पेज, जो समाज को आईना दिखाने वाले "लोकतंत्र के चौथे स्तंभ" को ही आइना दिखाता है । दूसरों की फर्जी ख़बर छापने वाले यहाँ खुद ख़बर बन जाते हैं ।

Related Post