मुगलकालीन इतिहास के पन्नों को पलटा जाए तो पता चलता है कि “मुगलों” के बीच गद्दी के “हवस” में मर्यादाओं और रक्त संबंधों की बलि चढ़ा देने का कलंकित “इतिहास” काफी पुराना है । गद्दी की “हवस” में कई दफा अपनों का ही “रक्त” बहाया गया ! जहाँ “औरंगज़ेब” ने गद्दी के लिए अपने सगे भाइयों दारा शिकोह, शाह शुजा, मुराद की “हत्या” करवाई और पिता “शाहजहाँ” को ताउम्र “क़ैद” में सड़ने के लिए छोड़ दिया…वहीं “जहाँगीर” ने “गद्दी” के लिए अपने ही पुत्र “ख़ुसरो” की आँखें फुड़वा दीं ! “अल्लाउद्दीन खिलजी” जैसे शासकों ने तो अपने सगे चाचा “जलालुद्दीन” का ही “कपट” से “वध” कर डाला…और अपनी सगी “चचेरी” बहन से “विवाह” कर लिया । सत्ता की “लिप्सा” में अपनों को छलने और मार डालने की यह “कुत्सित” परंपरा अत्यंत “प्राचीन” है…और दुखद यह है कि गद्दी के “हवस” की वही “मक्कारी” और “षड्यंत्रकारी” मानसिकता आज भी कुछ “तुर्की” मानसिकता वाले तत्त्वों की “रगों” में हिलोरे मार रही है । लगभग सात वर्ष पहले की घटना है । गोरखपुर में भी “दरगाह” की गद्दी कब्जाने के लिए “दरगाही बदमाश” के इशारे पर उसकी एक “कनीज़” लौंडिया ने अपने संवैधानिक “भीमास्त्र” का प्रयोग कर दिया था । हालांकि “भीमास्त्र” से आहत हुए “चुम्मन मियाँ” (परिवर्तित नाम) का उस सारे “माजरे” से कोई वास्ता नहीं था ! लेकिन “दरगाह” की गद्दी हथियाने के लिए “दरगाही बदमाश” के इशारे पर छोड़े गए संवैधानिक “भीमास्त्र” की मारक क्षमता को “चुम्मन मियाँ” भाँप नहीं पाए…और एक बेहद ही घटिया “वेपनाइज़्ड” आरोप के शिकार हो गए । “दरगाही” बदमाश की “कनीज़” लौंडिया जैसी “कुल्टायें” ही उन सभी “लड़कियों” के लिए “विश्वास” खत्म करने का काम करती हैं… जो “समाज” में वाकई “यौन” भेदभाव और “यौन” प्रताड़ना झेलती हैं । “व्यवस्था” से घिन तो तब आती है…और हैरत तो तब होती है…जब ऐसी “कुल्टाओं” और “दरगाही अय्याशों” के सपोर्ट के लिए कोई “सफेदपोश” कोई “कालाकोट” कोई “माइकधारी” और कोई “वर्दीधारी” खड़ा होता है ।
दरगाह फंडिंग का नया खलचरित्र अफजल गुरु (कोड नेम)
बहरहाल, “दरगाह” से जुड़े फंडिंग प्रकरण में एक और ऐसा “खलचरित्र” सामने आया है…जो दरगाहियों के बीच “अफजल गुरु” के “कोड नेम” से मशहूर है ! यह “खलचरित्र” पेशे से एक मामूली “शिक्षक” है…लेकिन इस शिक्षक पास शहर भर में लगभग आधा दर्जन “जिमखाने”….कई विदेशी “प्रोटीन पाउडर” की दुकानें… कुछ “फैक्ट्रियाँ” और देश विदेश में अरबों की अकूत “संपत्ति” है । लोग अपने बालों की सफेदी छिपाने के लिए लाख जतन करते हैं…लेकिन इस शख्स के बालों की “भेड़ खाल” जैसी सफेदी ही इसकी पहचान है । “ब्रेन वाश” की “विधा” में इस शख्स को इस कदर “महारत” हासिल है…जैसे आतंकी “अफजल गुरु” की देह से निकल कर यह “विद्या” सीधा इस शख्स के अंदर समाहित हो गयी हो । “ब्रेन वाश” की कला में पारंगत कथित “कोड नेम” वाले “अफजल गुरु” का जलवा कुछ ऐसा है…कि ये “शिक्षक” होने के साथ ही मान्यता वाले संस्था के “संस्थापक” भी है…और दो दो पत्रकार संगठनों के “सदस्य” और “पदाधिकारी” भी ! “कोड नेम” वाले “अफजल गुरु” ने जब “पत्रकारिता” का इतना ढेर सारा दायित्व अपने कंधों पर संभाल ही रखा है…तो निश्चित तौर पर ये वर्तमान “भारतीय मीडिया” के प्रकाशमान “ध्रुव तारा” होंगे ! इनके “सत्य” का ओज “सूर्य” की तरह “अप्रतिम तेजोमय” होगा ! इसलिए इनकी पत्रकारिता को “भूमि” पर मुँह के बल गिरकर “प्रणाम” कीजिये…और जीवन की “बहाव धारा” में समाहित “जटिलता” को समझने का जरा प्रयास कीजिये । “बहाव” शब्द मामूली नहीं है…इसलिए हिंदी के “बहाव” शब्द को मामूली समझने की “भूल” बिल्कुल भी मत करें। अगर हिंदी के “बहाव” शब्द को उल्टा पढ़ें तो यह “उर्दू” का शब्द “वहाब” बन जाता है । “वहाब” अरबी मूल का शब्द है…और इसका अर्थ है बहुत अधिक देने वाला या बार बार “दान” करने वाला !
जब डाकू खड्ग सिंह भी इनसे बेहतर निकला !
हिन्दी के प्रसिद्ध कहानीकार “सुदर्शन जी” द्वारा लिखित “कालजयी” रचना “हार की जीत” में जब डाकू “खड्ग सिंह” एक रोगी वृद्ध का वेश धारण कर “बाबा भारती” से “अश्वारोहण” कराने की “याचना” करता है…और घोड़े पर सवार होते ही जब वह डाकू “बाबा भारती” के प्रिय “अश्व सुल्तान” को छल कपट से छीन ले जाता है…तो “बाबा भारती” कहते हैं कि…हे “खड्ग सिंह” तू “घोड़ा” ले जा… लेकिन यदि कोई तुझसे पूछे तो यह मत बताना कि तूने रोगी वृद्ध का वेश धारण करके “घोड़ा” छल कपट से छीन लिया था । यदि लोगों को यह पता चला…तो लोग उनकी “सहायता” भी करना बंद कर देंगे…जिन्हें सहायता की “सच” में आवश्यकता है । “कोड नेम” वाले “अफजल गुरु” और दरगाही बदमाश का कार्य तो बिल्कुल डाकू “खड्ग सिंह” जैसा ही है…परंतु इनके जमीर का रत्ती भर हिस्सा भी डाकू “खड्ग सिंह” के किरदार से मेल नहीं खाता ! यही कारण है कि दरगाही “कुल्टाओं” “अय्याशों” और “अफजल गुरु” जैसों का चरित्र “सुदर्शन जी” द्वारा रचे गये “खड्ग सिंह” के चरित्र से भी कहीं ज्यादा “निकृष्ट” हैं । हालांकि “पश्चाताप” की अग्नि में जलने के बाद डाकू “खड्ग सिंह” घोड़े को वापस “बाबा भारती” के मंदिर के “अस्तबल” में बाँध गया था…लेकिन ये “दरगाही बदमाश” “कुलटाएं” और “अफजल गुरु” जैसे लोग तो समाज, इंसानियत और राष्ट्र के साथ “घात” करते हुए सार्वजनिक रूप से अपनी “बेहयाई” का “बखान” भी करते हैं ।
मदरसों को लेकर डिप्टी सी एम और सीओ कोतवाली का रूख अलग अलग क्यों ?
एक तरफ प्रदेश के डिप्टी सीएम साहब का वह वक्तव्य “सोशल मीडिया” पर अत्यधिक प्रसारित (वायरल) हुआ…जिसमें वे यह दावा करते सुनाई और दिखाई दे रहे हैं कि…”मदरसों” में केवल “आतंकवादी” पनपते हैं ! डिप्टी साहब कहते हैं कि चाहे “मदरसा” कोई भी हो…वह “आतंकवाद” की “जननी” और उसकी “प्रयोगशाला” है । देखिए वीडियो…
अब दूसरी तरफ “कोतवाली” के क्षेत्राधिकारी (सीओ) साहब की कार्यप्रणाली को देखिए ! ये डिप्टी सीएम साहब की सोच से बिल्कुल भी “इत्तेफाक” नहीं रखते । इसलिए ये प्रशासनिक “व्यवस्था” की आँखों में धूल झोंककर “दरगाह” के आवरण में संचालित अवैध “मदरसों” को संरक्षण देने हेतु एक “कल्पित” और “असत्य” आख्या (झूठी रिपोर्ट) प्रेषित करते हैं…कि “दरगाह” में कोई “मदरसा” संचालित नहीं होता । देखें रिपोर्ट…

दरगाह पर अवैध मदरसे को लेकर मारपीट नें कराई किरकिरी
सीओ साहब की इस “असत्य” आख्या के कुछ ही दिनों पश्चात “दरगाह” पर एक अनपेक्षित “घटनाक्रम” घटित होता है ! अवैध “मदरसे” में पठन पाठन को लेकर एक “अभिभावक” तथा “दरगाह” से जुड़े “माइकधारी” “अराजक” तत्त्वों के मध्य हिंसक झड़प हो जाती है…जिसके उपरांत “एसएसपी” साहब के आदेश पर पुलिस बदमाश इक़रार और उसके माइक धारी टट्टुओं पर “मुकदमा” पंजीकृत कर लेती है । रही सही कसर “वक्फ बोर्ड” के उस आधिकारिक “प्रपत्र” ने पूरी कर दी…जिसमें “दरगाह” पर संचालित “मदरसे” का स्पष्ट विवरण अंकित है । (देखें रिपोर्ट)

सीओ कोतवाली समेत सीओ कैम्पियरगंज पर आरोप..कॉल रिकॉर्डिंग का दावा
इसी बीच एक नया “विवाद” भी गहरा गया है ! क्षेत्राधिकारी (सीओ) कोतवाली पुनः “दरगाही उपद्रवी” को प्रश्रय देने के “संगीन” आरोपों के घेरे में हैं । आरोप है कि जनाब अपने सहपाठी सीओ कैम्पियरगंज के माध्यम से शातिर अपराधी “इक़रार” का नाम “अन्तर्राज्यीय हनीट्रैप गिरोह” के मुकदमे से हटाने के लिए थाना चिलुआताल के “विवेचक” पर अनुचित “दबाव” बना रहे हैं । इन आरोपों के समर्थन में कुछ “कॉल रिकॉर्डिंग” होने का दावा किया जा रहा है । कॉल रिकॉर्डिंग में स्पष्ट सुना जा सकता है कि इस “अन्तर्राज्यीय हनीट्रैप गिरोह” का असल सूत्रधार “दरगाही बदमाश इक़रार”‘ ही है । रणनीतिक कारणों से उपलब्ध तमाम “सबूतों” में से “विवेचक” के सिर्फ एक “ऑडियो” का कुछ अंश ही यहाँ “प्रसारित” किया जा रहा है । सुने ऑडियो !
उपलब्ध अन्य कॉल रिकॉर्डिंग के अनुसार “विवेचक” यह कहते हुए सुने जा सकते हैं कि “विवेचना” के क्रम में वे दिल्ली तक “इक़रार” की “कनीज़ लौंडिया” को ढूंढते हुए पहुँचे…लेकिन “कनीज़ लौंडिया” भाग खड़ी हुई । दिल्ली पुलिस ने लिखकर दिया कि इस मामले में उनके “थाने” और “मुहर” की “कूटरचना” की गई है । मतलब बदमाश इक़रार ने गोरखपुर में बैठ कर राजधानी पुलिस के थानों की नकली “मुहर” और “जीडी” दोनो बना डाली । दो “गुर्गे” जो “गैंगरेप” के फर्जी मुकदमे दर्ज कराने की “सुपारी” लेकर “इक़रार” के इशारे पर “दिल्ली” पहुँचे थे…उन “गुर्गों” की घटना के दरम्यान इक़रार से हुई कई “दफा” बातचीत की “सीडीआर” रिपोर्ट भी “विवेचक” को मिली है…बावजूद इसके उन “गुर्गों” की धर पकड़ के लिए विवेचक को “बिहार” जाने की अनुमति नहीं दी जा रही है । इतना सब कुछ मिलने के बाद भी चिलुआताल थाने के “विवेचक” पर बदमाश “इक़रार” को “क्लीन चिट” देने का निरंतर दबाव “सीओ साहब” द्वारा ही बनाया और बनवाया जा रहा है ।
दरगाह की माइक आई डी थामे अराजक तत्वों को मिलती है दरगाह से तनख्वाह
विवेचक पर “इक़रार” का नाम निकालने के भारी दबाव की “भनक” मिलते ही “दरगाह” की “माइक आईडी” थामे कुछ “अराजक” तत्त्वों का उत्साह “चरम” पर पहुँच गया है । ये उपद्रवी अब दरगाह, कोतवाली, राजघाट और तिवारीपुर थानों की प्रशंसा के “कसीदे” पढ़ते पढ़ते अपनी सीमाएँ लांघकर चिलुआताल थाने की जय जयकार में “लवलीन” हो गए हैं । “दरगाही हैंडल” से चिलुआताल थाने की “गगनचुम्बी” जय जयकार हो रही है ! थानेदार साहब को पता भी नहीं है…और उन्हें “द्रुत” प्रशंसा वाले “एफिल टावर” के सबसे “शीर्षस्थ” मुहाने पर चढ़ाकर नीचे से चुपचाप “सीढ़ी” हटा ली गई है ! “पुलिस” से भी बदतमीजी करने का हौसला रखने वाले “माइक” थामे इन “दरगाही” “उपद्रवियों” के बारे में “दरगाह” से जुड़े एक बेहद नजदीकी सूत्र ने बताया है.. कि इन “दरगाही” उपद्रवियों को हर माह 20 से 25 हजार की “तनख्वाह” दरगाह से मिलती है । “नमक हलाली” सीखनी है तो “माइक” थामे इन “दरगाही उपद्रवियों” से सीखिए साहब ! महज 20 से 25 हजार “माहवार” के खर्चे पर जब ये “ऑन ड्यूटी” सिपाही से भी भिड़ जाते हैं… तो फिर आपको तो “सरकार” बहुत कुछ देती है…फिर आपकी “नमक हलाली” को “जंग” क्यों लग जा रहा है ?

रात डेढ़ बजे के वायरल वीडियो ने चिलुआताल पुलिस पर खड़े किए सवाल
इसी मध्य वादी मुकदमा शाहिद द्वारा एक और वीडियो उपलब्ध होने का दावा किया जा रहा है । वीडियो के आधार पर आरोप है कि “हनीट्रैप” प्रकरण में अभियुक्त “इक़रार” को दोषमुक्त करने पर आमादा थाना चिलुआताल के वर्दीधारी अधिकारी कुछ दिन पूर्व वादी के आवास पर “अर्धरात्रि” को डेढ़ बजे उसे “भयभीत” करने पहुँचे थे । आखिर वादी के घर रात डेढ़ बजे क्या करने पहुँचे थे चिलुआताल थाने के अधिकारी ? और क्या चिलुआताल पुलिस द्वारा “बदमाश” इक़रार के प्रति दिखाई जा रही इसी निष्ठा और स्वामिभक्ति से अभिभूत होकर ये “माइकधारी अराजक तत्त्व” सोशल मीडिया पर चिलुआताल थाने का “गुणगान” कर रहे हैं ?
संरक्षण की जमीन और दुविधा के बीच सीओ साहब !
आखिर इतनी दुविधा में क्यों हैं साहब ? यदि “दरगाही उपद्रवी” आपकी दृष्टि में इतना ही “सिद्धपुरुष” और “महिमामंडित” व्यक्तित्व है… तो खुलेआम “पत्रकार वार्ता” (प्रेस कॉन्फ्रेंस) आयोजित कर उसका “अभिनंदन” कीजिए ! आपको किसने रोका है ? यदि “आस्था” के “आवरण” और “दरगाह” की आड़ में पनप रही “सामाजिक” और “राष्ट्रविरोधी” गतिविधियों को “संरक्षण” प्रदान करना ही आपका “ध्येय” बन चुका है…तो खुलकर कीजिए ! आपको किसने रोका है ? यदि इस छद्मवेशी “हनीट्रैप गिरोह” के “कुकृत्यों” पर पर्दा ही डालना है…तो अपनी “खाकी” वर्दी के “थान” से एक नया “तिरपाल” सिलवा लीजिए ! आपको किसने रोका है ? और यदि इक़रार जैसे “व्यभिचारी” और “अराजक तत्त्व” की रक्षा के लिए दो चार “निरपराधों” की “लाशें” गिरानी ही पड़े…तो बेझिझक गिराइए ! आपको किसने रोका है ? जब आप उस दो टके के अय्याश और बदमाश “इक़रार” के लिए अपने विभागीय सिपाही दरोगा को भी बेघर करके रातों रात सड़क पर लाकर खड़ा कर सकते हैं…तो फिर बाहरी लोगों की क्या औकात…जो आपको दरगाह “चालीसा” का पाठ और इक़रार “मंत्र” का “जाप” करने से रोक सके !
लाख रुपये की डील के बाद थाना कैन्ट में लिखा गया मुकदमा
सिर्फ आरोप ही नहीं बल्कि प्रमाण भी हैं…कि “दरगाही बदमाश” जब पत्रकारों के खिलाफ दिल्ली में “गैंगरेप” का मुकदमा दर्ज करवाने में सफल नही हो सका…तो उसकी “साजिश” और “मक्कारी” के “रथ” को आगे बढ़ाने के लिए “सुपारी” दी गयी…और थाना “कैन्ट” में उन पत्रकारों के खिलाफ दरगाही बदमाश की “कनीज़ लौंडिया” को खड़ा कर “डकैती” का मुकदमा दर्ज करा दिया गया । “हनीट्रैप गैंग” मामले में तमाम सबूत “दरगाही बदमाश” के खिलाफ होते हुए भी उसकी “गिरफ्तारी” का “रथ” रोकने के लिए “मंदिर कनेक्शन” की “अफवाह” उड़ा दी गयी । थाना कैन्ट में दर्ज हुए “डकैती” के फर्जी मुकदमे में “अफजल गुरु” “बकैती” करते हुए सुने गए हैं…कि इस मुकदमे की आड़ में ही अय्याश इक़रार के “कुकर्मों” के खिलाफ आवाज उठाने वालों की “लाशें” पुलिस से ही गिरवा दी जाएगी । लेकिन यह कदापि मत भूलना “अफजल गुरु” कि…इस बार “दरगाह प्रकरण” के “गर्त” में छिपे वे तमाम प्रामाणिक “तथ्य” और अकाट्य “साक्ष्य” चीख चीखकर यह उद्घोष कर रहे हैं…कि “समाजद्रोह” और “राष्ट्रद्रोह” के विरुद्ध उठने वाली आवाज़ें अब किसी खामोशी की “चादर” तले “आच्छादित” होकर “दम” नहीं तोड़ेंगी…और न ही इस बार इन आवाज़ों को “सलाखों” के पीछे या “कालकोठरी” की “वीरान” दीवारों में चुपचाप “दफ़न” किया जा सकेगा ! कुकर्मों की “फ़ेहरिस्त” तो अब धिक्कारते हुए यह कह रही है…कि इन “दरगाही” खलचरित्रों और उनके “समर्थकों” समेत इनके समस्त “संरक्षकों” से तीन पीढ़ियों तक “द्विज” होने का अधिकार छीन लिया जाना चाहिए । “समाज” के तौर पर सबसे बड़ी सजा तो यही होगी…और शेष “सजा” तो “कानून” दे ही देगा ! याद रखिए…कि “वर्दी” जब तक कर्तव्य की “ढाल” रहती है…तभी तक “पूजनीय” है ! परंतु जब वही “खाकी” अपराध की “पैरवी” में उतर आए…तो “इतिहास” उसे कभी “क्षमा” करने की इजाजत नहीं देता ! “सत्य” को दबाने और “इक़रार” को बचाने के लिए चाहे जितनी “साजिशों” के “व्यूह” रच लिए जाएं…लेकिन इस प्रकरण में संरक्षण देने वाले “सूरमा” से लेकर शरण पाने वाले “बदकिरदार” तक सबकी जवाबदेही तय होकर रहेगी ।

